सम्पादकीय
18-02-2026 Posted by: सम्पादक (पिघलता हिमालय)
जमीन से जुड़े अधिकारी हैं ललित मोहन रयाल
ज्यादातर देखा जाता है कि किसी बड़े पद को प्राप्त कर लेने वाले अपने बीते हुए दिनों, अपने गाँव-घर, स्थिति-परिस्थिति को एकदम भूल जाते हैं और हड़बड़ में निर्णय लेने लगते हैं या चाटुकारिता के साथ एक विशेष घेरे में कैद सा हो जाते हैं। लेकिन पद प्राप्त करने के बाद भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने वाले हमेशा मिट्टी की खुशबू से होते हैं। ऐसे ही अधिकारियों में से हैं- ललित मोहन रयाल। श्री रयाल की प्रशंसा कर दी जाए तो वह खुश हो जाएंगे, ऐसी बात नहीं है। नैनीताल जिले के जिलाधिकारी श्री रयाल का कद इसलिये ही बड़ा दिखाई देता है क्योंकि वह लोकव्यवहार के साथ तर्कसम्मत बातें करते व सहते हैं। लोक प्रशासन की पढ़ाई उन्होंने की होगी और उच्चपद पर आने के सारे मानक उनके पास होंगे बात यह नहीं है। इससे भी ज्यादा उन ...
आगे पढेंसरोवर नगरी फाल्गुन मास में तर
18-02-2026 Posted by: सम्पादक (पिघलता हिमालय)
नैनीताल। सरोवर नगरी फाल्गुन मास में तर इसलिए दिखाई दे रही है क्योंकि पर्यटकों की आवाजाही फिलहाल मस्त है। चंूकि कोरोन काल के बाद से कई तरह की दिक्कतों ने इस नगरी को घेरे रखा है। हालात ढप से बेढप बनते रहे हैं इस शहर के। ताल तो वही है लेकिन आने वालों को नराजा बदला दिख रहा है। प्रशासन की सौन्दर्यकरण स्कीम ने चौड़ीकरण से लेकर सुधारीकरण का जो अभियान चलाया उसमें वह सब हुआ जो प्रशासन चाहता था। ऐसे में ताल के पास जाते दिखाई देने वाले गांधी जी की प्रतिमा अब दूसरे कौने में है, जबकि बैठे हुए गांधी जी और तीन बन्दरों की प्रतिमा नई आभा के साथ दिखाई दे रही है। ...
आगे पढेंजसुसी बूढ़ी शौक्याणी की धरोहरों पर मंथन
18-02-2026 Posted by: सम्पादक (पिघलता हिमालय)
हल्द्वानी। पिघलता हिमालय के संस्थापक सम्पादक स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती का स्मृति समारोह में इस बार ‘हिमालय के लोक व्यवहार में कला और विज्ञान’ विषय पर केन्द्रित है। इसका मुख्य मुख्य केन्द्र दानवीरांगना लला जसुली बूढ़ी शौक्याणी हैं क्योंकि जिस प्रकार की कला नमूने उनकी धर्मशालाएं हैं और जिस प्रकार का विज्ञान पुराने समय के लोगों का रहा है, वह हमारे बुनियाद के पत्थर और इतिहास हैं। लला जसुली की धरोहरों को खण्डहर, अतिक्रमण से बचाने और इन्हें संरक्षित करने का अभियान इसके बंशजों ने उठाया है। जीर्णोद्धार एवं सौन्दर्यीकरण समिति कैलास यात्रा पथ पर तिब्बत तक चार सौ से अधिक धर्मशालाओं की बराबर टोह ले रही है। लगातार पत्राचार व अनुनय-विनय के बाद कुछ धर्मशालाओं के सौन्दर्यीरण में सफलता भी मिली है। लेकिन इहितास ...
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