पिघलता हिमालय से प्रकाशित पुस्तकें

घोंसला (कहानी संग्रह)

एक कुमाउनी मुहावरा है- सोच गुम पड़ जाना। ‘घोंसला’ की कहानियां प-सजय़ते हुए जाने क्यों यह शब्द मन में गूंजता रहा। हिन्दी कहानी आज की क्या कलावाद और क्या जनवाद दोनों दिशाओं में खूब पफर्राटे से भागती नजर आ रही है। ऐसी चमकदार कहानियां पाठकों को परोसने वाले नेतृत्वकामी और भूतपूर्व लेखक सम्पादक बनकर उन्हें आज के सर्वाधिक तेजतर्रार कथाकारों की तरह पेश कर रहे हैं। कहानियां ही क्यों कहानीकारों के ‘बायोडाटा’ भी विज्ञापन कला के लेटेस्ट नमूनों को भी मात देते लगते हैं और पत्रिका भी अपने आप में माॅल की तरह रंगी-चुंगी, सजी-संवरी।

आनन्द बल्लभ उप्रेती को जितनी इस ‘जन’ के जीवन की और चरित्रा की प्रमाणिक जानकारी है, उतनी ही जिस परिवेश और संस्कृति में यह ‘जन’ पला-पुसा है, ग-सजय़ा गया है जिसमें उस सभ्यता, संस्कृति और धर्म की पक्की-पूरी समझ है। उनकी कहानियां किस्सागोई का अतिक्रमण करके बोध-कथा की झंकार पैदा करने की कोशिश में रची गयी जान पड़ती है। ‘केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिये, उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए.........’ हमारे राष्ट्रकवि का यह कथन कवियों पर ही नहीं, कथाकारों पर भी लागू होता है। आज की इस घड़ी मंे तो खास तौर पर ही नहीं, जब भीतरी और बाहरी दोनों प्रकार के दुश्मनों से हमारा समाज ही नहीं, उसका परम्परागत सहज ज्ञान और संस्कृति भी बुरी तरह आक्रांत जान पड़ते हैं। ऐसे में साहित्य की एक अतिरिक्त जिम्मेदारी सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा की चैकसी के अलावा एक प्रतिरोध की संस्कृति निर्मित करना भी हो जाती है। जैसा कि इन कहानियों से ‘एटरंडम’ उठाकर उफपर टांक दिए गए उरणों से व्यंजित होगा। आनन्द बल्लभ उप्रेती को कथा लेखन की प्रेरणा ही मानो इसी दोहरी-तिहरी जिम्मेदारी के तीखे अहसास के भीतर से मिलती रही है।

व्यंग्य इस कहानीकार की फितरत में है। पर वह व्यंग्य के लिए व्यंग्य का कायल नहीं वह अपने लोगों की शक्ति और असक्ति दोनों से परिचित है। सर्वाधिक चि-सजय़ ओर आक्रोश उसका राजनीतिकों पर निछावर हुआ है। राजनीति आज पहले के युगों की तुलना में कई गुना अधिक ताकतवर चीज हो गई है, पर हमारे देश में स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद उससे जनाकांक्षाओं की पूर्ति का, साक्षरता के प्रसार का, दरिद्रता के उन्मूलन और खुशहाली लाने की जो भी प्रत्यााशाएं जगी थीं, वे अधिकांशतः अतृप्त रही आई हैं। ऐसा नहीं कि समृ(ि नहंी ब-सजय़ी, पैदावार नहीं ब-सजय़ी,और स्कूल-कालेजों की बा-सजय़ नहीं आई। यह सब हुआ मगर............ जिसे गांधी जी आखिरी आदमी-यानी समाज के सबसे पिछड़े और प्रंवचित दीन-हीन तबकों का आदमी कहते थे और जो इस देश की आधी आबाद के बराबर है, उसकी हालत नहीं सुधरीं विकास का लाभ उन तक नहीं पहुंचा। भ्रष्टाचार की सूची में भारत इतना उफपर है कि देख के दहशत होती है। शिक्षा के अभाव में देश की जनता का एक प्रतिशत भी रचनात्मक कार्यों में भागीदारी नहीं कर पाता। उप्रती जी की कहानियों में इस बुरी तरह ठगे गये भारतीय जन का दर्द बोलता है। राजनेताओं के प्रति उनका क्षोभ सच्चा और उग्र है। किंतु कहानी की संरचनात्मक मांग के साथ उनकी इस राजनैतिक संवेदना और समझ का पूरा तालमेल बैठना अभी शेष है। कहानी में एक सम्पूर्ण कथा-स्थिति, एक समूचा परिवेश अपने जीवन्त ब्यौरों में मूर्तिमान हो, चरित्रों के बीच घात-प्रतिघात का जीवन्त ड्रामा खड़ा हो, तभी उसका राजनैतिक कथ्य या व्यंग्य भी जिए जा रहे जीवन की सगुण शब्दावली में से छनकर वांछित प्रभाव की सृष्टि करता हैं ‘कोबरा’ में जो सम्भावना कौंधती है उसक एक विस्तृत परिवेश में जीवन्त विश्वसनीय चरित्रों के माध्यम से चरितार्थ होना होगा। इस दृष्टि से ‘घंटा’ कहनी अपेक्षाकृत भरी-पूरी और अपेक्षित प्रभाव उत्पन्न करने वाली है।

‘बायोडाटा’ और उनकी कुछ अन्य कहानियों में अपने परिवेश और लोगों के चरित्रा पर -सर्वव्यापी लालच की तमीज पर भी-लेखक की पकड़ बड़ी साफ और विश्वसनीय लगती है। जिन काहनियों में लेखक की विषय वस्तु प्रत्यक्षतः सामाजिक और राजनैतिक संदर्भों वाली नहीं हैं, जैसे ‘घोंसला’ में, उनमें भी बड़े बारीक संकेत जीवन की आलोचना के उभरते हैं। यह भी लगता है कि लेखक के आंख-कान बहुत चैकन्ने हैं। जो भी उसके आस-पास घटित हो रहा है-अच्छा और बुरा, उस पर उसकी नजर बराबर लगी रहती है। यह भी विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि अपनी अपेक्षाकृत बेहतर कहानियों में यह लेखक अपने को यानी अपनी मुखर आलोचनाप्रवण और क्षुब्ध व्यक्तित्व को पृष्ठभूमि में रख पाने में और पात्रों तथा परिवेशगत चित्रों-संदर्भों से ही अपने कथ्य को झलकने देने का कौशल दर्शाता है। यह कौशल, यह संयम, यह वातावरण-निर्मित एक कथाकार के लिए आवश्यक गुण है। बात बोले, लेखक नहीं, यह कहानी कला का आधारभूत सिद्धांत है। इन कहानियों से ही यह आशा भी बंधती है कि यह कथाकार बिना अपने सात्विक क्षोभ को तनिक भी कम किए, उसे अधिकाधिक निर्वैयक्तिक रूपाकार में -सजयालने की सिद्धि की तरपफ सजय़ता पूर्वक अग्रसर होगा। उसमें सार्थक कथाकारत्व के सभी गुण आभासित होते हैं- वर्णन क्षमता, कथोपकथन, संवाद की जीवन्तता, पहाड़ी बोल-चाल की भाषा की रंगतं, समस्याओं की समझ, मानव चरित्रा और समाज की समझ ;जैसे मसलन,‘भबर्योव’ कहानी में विद्याधर मास्टर के चरित्रा चित्राण में झलकती हैद्ध,समाज के विभिन्न वर्गों और पेशों के लोगां के आचरण, व्यवहार की निभ्र्रान्त समझ............ यह इन सब कहानियों में झलकती है। उप्रेती जी सोद्देश्य कथाकार हैं। स्पष्ट प्रतीत होता है प-सजय़ने वाले को, कि जब तक वे किसी बात को लेकर बेचैन नहीं हो जाते, तब तक लिखने बैठते नहीं, लिखना उनके लिये राहत कार्य भी है, भावनाअें के विरेचन जैसा। किन्तु इतना ही नहीं, वे अपने समाज का आईना भी बनाना चाहते हैं अपनी रचनाओं को और इसमें कमोवेश सपफल भी होते हैं। इन कहानियों में जगह-जगह सूक्तियां भी उभर कर आई हैं जो लेखक की सयानी समझ और अनुभव-परिपक्वता को झलकाती हैं। जरूरत अब इस बात की है कि लेखक की सामाजिक अन्तरात्मा और निर्माण-कौशल-यानी कथ्य और कहानी दोनों संश्लिष्ट और एकजान हो जाएं कि उन्हें एक दूसरे से अलगाया ही न जा सके।

रमेश चन्द्र शाह
भोपाल, म0प्र0

हिमालय संगीत एवं शोध समिति

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