पिघलता हिमालय से प्रकाशित पुस्तकें

राजजात के बहाने

हिमालय की प्राकृतिक विविधता ने जिस तरह यहाँ की सांस्कृतिक विविधता को स्वरूप दिया है उसी तरह आस्था का मिजाज भी प्रभावित किया है। हिमालय के प्राकृतिक व्यक्तित्व ने पुराण कथाओं के एक अन्तहीन क्रम को जन्म दिया। इतिहास और पुराण कथाओं की इतनी परम्परा अन्यत्रा दुर्लभ है। हर शिखर, ताल, नदी, दर्रे या गुपफा के साथ एक या अनेक कहानियां जुड़ी है- रोचक और रोमांचक।

हिमालय में लोक देवताओं की भी एक व्यापक परम्परा है। शैव, शाक्त तथा वैष्णव परम्परा इसके बाद आती है और बौ( व जैन पराम्परा भी। शिव का वर्चस्व सर्वत्रा है- अमर नाथ से कैलास और पंचकेदारों से काठमाण्डो तक। शिव हिमालय के निर्विवाद देवनायक हैं पर शाक्त परम्परा का सिलसिला भी कम व्यापक नहीं है यदि एक ओर हिमालय के दक्षिणी -सजयाल में कामाख्या से वैष्णो देवी तक देवियों के स्थान स्थापित हैं तो सर्वोच्च शिखरों में भी देवियां विराजती हैं। जैसे चोमोलोंगमा ;एवरेस्ट तथा नंदा देवी दोनों देवियों के नाम से जुड़े शिखर हैं। चोमोलोेंगमा का अर्थ है धरती की देवी। उत्तराखंड की नंदा देवी उक्त देवियों के क्रम में भी है और उनसे अलग भी। नंदा देवी पर्वत शिखरों का नाम है। यह एक मिथक है-नंद की बेटी से पार्वती तक पफैला हुआ- और यह ध्याणी भी है। यह पर्वत, मिथक और सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ का मिलाजुला रूप है। नंदा कदाचित अकेली देवी है जो सिपर्फ माॅ होने से इन्कार करती हैं वह बेटी, बहिन तथा बहू का रूप भी लेती है। वह नियन्ता है और निरीह भी। वह हिमालय की बेटी है और हिमालय का माॅ भी। वह कत्यूरियों की कुल देवी है तो चन्द-परमारों की बेटी भी। उसके नाम से जुड़े शिखर शिव के नाम से जुड़े शिखरों से कम नहीं हैं। वह आस्था की देवी और उल्लास और उदासी की देवी भी है। नन्दा देवी और लाटू को हम आज के अपने समाज में भी देख सकते है।

यह आस्था इतनी गहन है कि इसने नियमित सालाना-उत्सव-जात का रूप तो लिया लेकिन राजवंश के इस कथा से जुड़ जाने के बाद इसके अनेक सालों में होने वाली राजजात का रूप भी लिया। इस राजजात ने कभी भी कुंभ शैली की निश्चित बारह साल में होेने वाली सांस्कृतिक घटना का रूप नहीं लिया। इसका आयोजन किसी प्रकोप या दोष के कारण होता है अथवा बिना मनौती के ही चैसिंगी खाडू के जन्म लेने पर मान लिया जाता है कि नन्दा देवी मनौती मांग रही है।

सामान्य नंदा जात तो हर साल उत्तराखंड के मध्यवर्ती क्षेत्रा ;नंदा देवी शिखर के तीन ओर- पिथौराग-सजय़, बागेश्वर, चमोली जिलोंद्ध में आयोजित होती है। वहां के निवासी नंदाष्टमी के मौके पर बुग्यालों में कुछ निश्चित स्थानों तक की यात्रा करते हैं। इसी दिन उत्तराखंड के उक्त तीनांें जिलों के अलावा अल्मोड़ा, नैनीताल, रूद्रप्रयाग, टिहरी तथा पौड़ी जिलों में मेलों का आयोजन और डोलों का उठान होता है। लेकिन अनेक सालों बाद आयोजित होने वाली नंदादेवी राजजात का निश्चित मार्ग हैं। यह नौटी गांव से चलती है। आटागाड़, पिण्डर, कैल नदियों की घाटियों के साथ रूपकुण्ड-ज्यूंरागली पार कर होमकुण्ड ;कैलासद्ध तक पहुंचती है, जो त्रिशूल शिखर के नीचे 17,000 पिफट पर स्थित है और पिफर नंदाकिनी के साथ नंदप्रयाग तक और अलकनंदा के साथ कर्णप्रयाग तक आकर नौटी लौटती है। इसका नेतृत्व कांसुवा के कुंवर, उनके महामंत्राी नौटी के नौटियाल तथा चैसिंग्या खाडू करते हैं। हजार-हजार लोग इसमें शामिल होकर इसे लोक यात्रा का रूप दे देते हैं।

2000 की नंदा जात में शामिल श्री आनन्द बल्लभ उप्रती ने ‘राजजात के बहाने’ दरअसल अपनी अन्य यात्राओं को भी स्मृति से शब्दों में उतार दिया है। इससे यह उजागर होता है कि नंदादेवी राजजात में शामिल यात्राी किस तरह प्रत्यक्ष यात्रा के साथ उन यात्राओें और स्मृतियों में भी डूब जाता है जो उसने अपने सामाजिक जीवन में अर्जित की होती हैं। ‘राजजात के बहाने’ शीर्षक से ही यह गंध आती है कि उसमें जितनी राजजात होगी उतनी ही अन्य स्मृतियां भी। इस पुस्तक से गुजरने के बाद श्री उप्रती से यह निवेदन करने का मन करता है कि वे अपने संस्मरणों को भी लिख डालें जो उनके और उनकी पी-सजय़ी के बचपन का स्पर्श देती हैं। यह इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में बीसवीं सदी और उससे भी पीछे देखने का प्रयास हो सकता है। फिलहाल जय नंदा।

शेखर पाठक
नैनीताल

हिमालय संगीत एवं शोध समिति

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