तिब्बत व्यापार के वो दिन और खाजा-खजूरे

तिब्बत व्यापार के वो दिन और खाजा-खजूरे

श्रीमती पार्वती रावत-श्रीमती हेमा बृजवाल से बातचीज

डॉ. पंकज उप्रेती

भारत-चीन व्यापार की वर्तमान स्थितियां एकदम अलग हैं। इस बार लम्बे अन्तराल के बाद यह व्यापार होने वाला है, जो कोरोना कारणों से स्थगित था। इसकी तैयारी हो रही है। लेकिन हमारे सीमान्त क्षेत्र से इस व्यापार की असल परम्परा इतिहास और संस्कृति का आधार है। सीमान्त के व्यापारी अपने तिब्बत मित्रों के साथ किस प्रकार से व्यवहार रखते थे वह जानना बहुत शिक्षाप्रद है क्योंकि दुर्गम स्थानों पर प्रकृति के साथ सामंजस्य रखते हुए जो कुछ किया जाता था वह त्यौहार सा माहौल बन जाता था। ऐसी ही रोचक जानकारियों के लिये आज श्रीमती हेमा बृजवाल और श्रीमती पार्वती रावत से बातचीज प्रस्तुत है। हेमा बृजवाल और पार्वती रावत आपस में समधन हैं। इन दोनों को ही बचपन में वह अवसर देखने का सौभाग्य है जब इनके घरों से तिब्बत व्यापार के लिये जाते थे और सारे ग्रामवासी व्यापारियों को जाते समय विदाई करते और आने पर स्वागत। बताते हैं- रास्ते के लिये भरपूर खाजा-खजूरे बनाये जाते थे। बातचीज का सिललिसा चलता रहे इससे सबसे पहले हेमा बृजवाल जी के बारे में बताते हैं। दरकोट में पिता जीवन सिंह सयाना माता श्रीमती खिमुली देवी के घर इनका जन्म हुआ। तल्ला दुम्मर बृजवाल परिवार में इनका विवाह हुआ। स्व. प्रताप सिंह बृजवाल के सुपुत्र थे स्व. जसवन्त सिंह जी। हेमा देवी का विवाह जसवन्त सिंह जी के साथ हुआ। इनकी अगली पीढ़ी में स्व. केदार सिंह, मनोहर सिंह, प्रेम सिंह, वीरेन्द्र सिंह और अंजू पांगती हैं। तिब्बत व्यापारी परम्परा में प्रत्येक परिवार से कोई न कोई जाता था जब 12 साल की उम्र में जसवन्त सिंह जी भी अपने परिवार से व्यापार में गये।
हेमा देवी का बचपन दरकोट, मल्ला दुम्मर में बीता। इनके बचपन की सखियों में रुकमणि देवी, पानुली देवी, हरकी देवी रहे हैं। अपने मायके में व्यापार की जिस परम्परा को इन्होंने देखा वही सब ससुराल में भी था। विवाह के बाद एक वर्ष तक यह मल्ला दुम्मर रहीं और फिर पति संग अल्मोड़ा आ गई। 1951 में जसवन्त सिंह बृजवाल ने यहाँ कारपेट एण्ड जनरल स्टोर खोला। थोक का व्यापार बेहतर चल निकला क्योंकि बृजवाल दम्पत्ति अथाह मेहनती थे। पहले यह गंगोला मोहल्ले में रहते थे, बाद में धर की तूनी शैल गाँव में अपना मकान बना लिया। हेमा बृजवाल अपनी उनी कारोबार की परम्परा को अल्मोड़ा में भी बनाए हुए थीं और इन्होंने एक सेन्टर चलाया जिसमें दन गलीचे, पंखी, पसमीना बनाया जाता था। बकायदा बालिकाओं को इसकी ट्रेनिंग दी जाती थी। सेन्टर चलाने के लिये शुरू में लखनउफ से सरकारी इन्तजाम भी हुए जो साल तक थे, इसके बाद अपने आप से आठ वर्ष तक इस सेन्टर को इन्होंने चलाया। सेन्टर में बनने वाले विभिन्न आकार के गलीचेे व उनी सामग्री को लेने लोग इनके पास आने लगे थे। इसके अलावा उत्तरायणी मेले में बागेश्वर और व्यापारिक मेले जौलजीवी में तक यहाँ से सामान जाता था।
अब श्रीमती पार्वती रावत जी के बारे में बताते हैं। इनके बूबू प्रेम सिंह जंगपांगी और पिता मेघ सिंह जी हुए। थल, मल्ला दुम्मर और बुर्फू तक माइग्रेशन परम्परा मेें परिवार की घुमन्तु व्यवस्था थी। साथ ही तिब्बत व्यापार का कारोबार। पार्वती देवी की शिक्षा माइग्रेशन स्कूलों की उस परम्परा में हुई है। तिकसैन मुनस्यारी में रहते हुए नमजला जाकर उन्होंने पढ़ाई की। वह बताती हैं गुरुजन अपने शिष्यों के लिये बहुत मेहनत करते थे। बच्चों द्वारा भी अपने गुरुजनों के लिये बहुत आदर था और बारी-बारी से खाद्य सामग्री, आटा-गुड़-घी, चूल्हा जलाने को लकड़ी उन्हें देते थे। ऐसे में शिक्षकों को माइग्रेशन जैसी शिक्षा व्यवस्था भी नहीं अखरती और वह चित्त लगाकर मेहनत करते थे।
कुशाग्र बुदिृध की पार्वती देवी शिक्षा के बाद शिक्षा विभाग में ही नौकरी करने लगी। नौकरी में वह अल्मोड़ा से धारचूला भी गईं लेकिन विवाह के बाद नौकरी छोड़ दी और एनटीडी, अल्मोड़ा अपने ससुराल में हैं। किशन सिंह रावत परिवार से इनका सम्बन्ध है। किशन सिंह जी के सुपुत्रों में विंग कमाण्डर नौसेना ज्योति सिंह, कर्नल रणजीत सिंह, कर्नल थल सेना खुशाल सिंह, विंग कमाण्डर वायु सेना प्रतिमन सिंह हैं।
खुशाल सिंह की सुपुत्री हुईं स्व.प्रोमिला देवी इनकी अगली पीढ़ी में नेहा बृजवाल जो दिल्ली में पीएनबी में मैनेजर हैं। इस पारिवारिक ताने-बाने के बीच पार्वती रावत अपने बचपन को याद करते हुए बताती हैं- तिब्बत यात्रा पर जाने वालों के लिये खाजा-खजूरे, सत्तू तैयार कर रखते थे। एक दिन पहले आसपास सारे लोगों को बुलाकर आयोजन होता था। आलू-पूरी ज्या जैसे व्यंजनों के साथ सब बैठक करते। ढोल वादक भी बुलाए जाते थे। रात्रि के इस आयोजन के बाद अगले दिन जब तिब्बत यात्रा पर व्यापारी निकलते तो उन्हें छोड़ने के लिये दूर तक जाते। जब व्यापार करके हूणदेश से लोग वापस आते थे तो तब भी घर लीपघीस कर खूब सजाया जाता था। व्यापारियों के आने का स्वागत किया जाता था। बचपन की यादगार बातों में वह बताती हैं- बूबू और पिता जी जब तिब्बत व्यापार से लौटकर आते थे तो अपने साथ लाए सामान को देखते और सबको दिखाते। इसके अलावा एक कमरे में पैसोें का हिसाब जोड़ते, तब बच्चों को वहाँ से हटा देते लेकिन हम छोटे बच्चे दीवारों के औने-कौने से देखते क्या हो रहा है। उस कमरे में चाँदी के सिक्कों के ढेरों को अलग-अलग कर लगाते हुए गिनती होती थी। एकआना, दोआना से लेकर अलग-अलग चाँदी के सिक्कों के ढेर बच्चों के लिये कौतूहल था, जो कि व्यापारियों ने दुर्गम यात्रा करते हुए जान जोखिम में डालकर अपने व्यापार में जुटाए थे।

पर्वतीय आभूषणों का कोई सानी नहीं, आधा किलो तक की हसुली बनती थी

नवीन चन्द्र वर्मा से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
उत्तराखण्ड सरकार में वरिष्ठ नागरिक कल्याण परिषद के उपाध्यक्ष श्री नवीन वर्मा भले ही राज्यमंत्री का दर्जा रखते हैं लेकिन उनकी कार्यशैली और समाज के लिये सोच उन्हें काफी आगे पहले से बनाए हुए है। व्यापारी नेता, उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी के अलावा स्वच्छ छवि के चलते उन्हें सरकार में भी जो अवसर मिला है उनके अनुभवों का लाभ समाज को होना ही है। मूलरूप से स्वर्णाभूषण के कारोबारी परिवार से होते हुए भी नवीन वर्मा जी सोच केवल व्यापारी बनकर रहने की नहीं रही और वह सामाजिक कार्यों में हाथ बंटाते रहे हैं। उत्तराखण्ड की राजनीति और यहाँ के व्यापारी नेता के रूप में वह कितने मजबूत हैं यह जानने से पहले वर्मा परिवार के बारे में आपको बताते हैं।
यह वर्मा परिवार मूलरूप से चम्पावत के तल्लीहाट का हुआ जो रीठासाहिब (रीठा) में चला गया था। श्री नवीन वर्मा के दादा कृपालाल वर्मा के चार पुत्रा, दो पुत्रियां हुईं- हीरा लाल, मोहन लाल, विशन लाल, देवीलाल, मोहनी और जयन्ती। इसके बाद हीरा लाल जी परिवार में राजेन्द्र लाल, प्यारेलाल, सुरेश वर्मा, कलावती वर्मा। मोहन लाल जी परिवार में नवीन चन्द्र, पूरन चन्द्र, स्व. विपिन, दिनेश चन्द्र, कुसुम वर्मा। विशन लाल जी के परिवार में प्रेमा वर्मा, स्व. गिरीश, भुवन चन्द्र, विमला वर्मा, मीना वर्मा, सुध्ीर, दीपा वर्मा, ललित। देवीलाल जी के परिवार में स्व. किशन वर्मा, स्व. किशोर, दीप चन्द्र, सुनील वर्मा।
सन् 1967 तक कृपालाल जी के इस संयुक्त परिवार का एक पड़ाव हल्द्वानी का भाबर था। जाड़ों में परिवार रीठा से हल्द्वानी आ जाता था। सन् 1968 के बाद हल्द्वानी में स्थायी रूप से निवास करने लगा। हल्द्वानी के पटेल चौक में ही नवीन वर्मा का जन्म हुआ। अपने नैनीहाल पहाड़पानी में रहकर जूनियर हाईस्कूल, चम्पावत से हाईस्कूल, एमबी कालेज हल्द्वानी से इण्टर, अल्मोड़ा में बीएससी, नैनीताल में एमएससी करने वाले श्री वर्मा जी का पैतृक कार्य स्वर्णाभूषण से जुड़ा था लेकिन इनकी रुचि खेल, घुमक्कड़ी, सामाजिक कार्यों में रही है। वर्तमान में तिकोनिया के गुरुतेगबहादुर मार्ग में उनका अपना आवास है। उनके साथ सौ वर्षीय माता श्रीमती माधुरी वर्मा का आशीर्वाद है। उनकी सामाजिक अभिरुचि में साथ देने वाली पत्नी श्रीमती बीना वर्मा हैं। वर्मा जी की अगली पीढ़ी में पुत्री अमिता वर्मा, दीपक वर्मा, तनुज वर्मा हैं।
इस प्रकार भले ही तल्लीहाट फिर रीठा से वर्मा परिवार का आगमन इस भाबर में हुआ है लेकिन नवीन वर्मा तो पूरी तरह जन्म से लेकर हल्द्वानी की पहचान हैं। यही कारण है शहर में नियोजित विकास को लेकर उनकी पुरानी मुहीम रही है। कारोबार के रूप में उनका ज्वैलरी का प्रतिष्ठान है लेकिन उनकी दौड़धूप से कोई नहीं कहेगा वह व्यापारी हैं। अपने पम्परागत कार्य पर चर्चा करते हुए वर्मा जी कहते हैं- पर्वतीय आभूषणों का कोई सानी नहीं। पहाड़ों में जिस प्रकार की ज्वैलरी का चलन रहा है, हम जैसे-जैसे चीन सीमा की ओर को जाएंगे वहाँ चाँदी का ज्यादा चलन है। मैदान को आते-आते इनका प्रकार बदल जाता है और सोने के आभूषण दिखाई देते हैं। पहले 250 ग्राम तक के सूते/सुतले गले के बनते थे। हाथ के धागुले 200 ग्राम तक और हसुली लगभग आधा किलो तक की होती थी। कमरबन्ध तो 500 ग्राम से कम के बनते ही नहीं थे। पहाड़ों में सोना उतना नहीं था लेकिन चाँदी के चलन ने सारे रिवाज पूरे किये, जो आज तक भी बने हुए हैं।
अपनी पढ़ाई के साथ खेल व टेªकिंग में अभिरुचि रखने वाले वर्मा जी ने पैदल यात्रा करते हुए दो बार कैलास मानसरोवर और 5 बार आदि कैलास यात्रा की है। वह कहते हैं- यात्राओं मेें बहुत कुछ देखने और सुनने-सीखने को मिलता है। मालपा में प्रकृति के कोहराम से पहले उन्होंने कह दिया था कि मालपा से बूदी के बीच गरमपानी के कई स्रोत हैं जिससे विस्फोट हो सकता है। अपनी यात्राओं में वह केवल जाना-जाना नहीं करते बल्कि हर यात्रा के पीछे अध्ययन भी होता रहा है। हल्द्वानी के भवानीगंज स्थित डॉ. निर्मल मुनगली के वहाँ किराये पर रहते हुए 1968 में इन्होंने अपना मकान बनाया। साथ ही शहर की हर भली गतिविधियों में जुड़े रहे। 1986 में व्यापार मण्डल से जुड़ गए। नगर उपाध्यक्ष, महामंत्री, प्रदेश मंत्राी रहे। पृथक राज्य बनने के बाद 2004 में व्यापार मण्डल के संयुक्त महामंत्री, 2009 से 2018 तक महामंत्री और 2018 से प्रदेश अध्यक्ष हैं।
राज्य आन्दोलनकारी के रूप में इनकी अग्रणीय भूमिका रही है। राज्य आन्दोलनकारी छात्रा संघर्ष समिति की टीम में 5 प्रमुख लोग थे जिसमें एन.सी.तिवारी संयोजक, हेमन्त बगड्वाल, दीवान सिंह बिष्ट, हुकुम सिंह कुंवर और वर्मा जी। 1998 में जमरानी बांध निर्माण संघर्ष समिति बनी, उसमें भी ये नेतृत्व की भूमिका में थे। जमरानी बांध आन्दोलन को लेकर बंशीधर भगत शुरुआत से रहे हैं लेकिन आन्दोलन को आगे बढ़ाने में इस समिति का योगदान गिना जाता है।
खेलों में रुचि के कारण नवीन वर्मा इससे जुड़े रहे हैं। 2004 सुरेन्द्र रावत जी ने स्पोटर््स एसोसिएशन बनाई थी। 1998-99 में विविधवत रूप से हल्द्वानी महोत्सव की नींव रखी। इस प्रकार शहर व इससे बाहर भी हर प्रकार से समर्पित रहते हुए नवीन वर्मा ने जिस प्रकार का मुकाम पाया है वह हमेशा सूझबूझ मार्ग दिखाने वाला रहा है। पार्टियों के झण्डे एक तरफ, इनकी स्वयं की ईमानदारी सकारात्मक उर्जा देती है।

कज्जाकी लुटेरों का आंतक था

Hot pursuit of Kazakh Bandits by a Johari Tradar

डॉ.नारायण सिंह पांगती से बातचीज

डॉ. पंकज उप्रेती
दुनिया का कालचक्र हमेशा दुश्वारियों से घिरा रहा है। अपने वर्चस्व, अपनी भूख, अपने शौक के लिये लड़ते-भिड़ते देशों व गिरोहों की अनगिनत कथा कहानियाँ इतिहास में हैं। जहाँ शान्ति की कामना की जाती है, वहाँ भी कोई न कोई अड़चन रही है। बात करते हैं भारत- तिब्बत सम्बन्धों और इनके बीच होने वाले व्यापार की तो पता चलता है कि हमेशा से हिमालयी राज्यों व देशों का सम्बन्ध् मधुर रहा है लेकिन आक्रान्ताओं की नीयत और अत्याचार ने इन शान्त वादियों को भी नहीं छोड़ा। ऐसा ही आतंक एक बार कज्जाकी लुटेरों का था और इनका पीछा करने वालों में बहादुर शौका व्यापारी स्व.शेरसिंह पांगती का नाम है। जर्मनी के शोधार्थी एल्मार ग्रेपा ने अपने अध्ययन में भी इसकी खोज की थी, बाद में डॉ.आर.एस. टोलिया व सुरेन्द्र सिंह पांगती से प्रेरित होकर डॉ.एन.एस.पांगती-श्रीमती जया पांगती ने इस महत्वपूर्ण इतिहास को पुस्तक का रूप भी दे डाला। ‘एक जोहार व्यापारी द्वारा कज्जाकी लुटेरों का पीछा’ की चर्चा से पहले डॉ.पांगती के बारे में जान लेते हैं। एक थे- रामसिंह पंागती जी। इनके दो पुत्र हुए- शेरसिंह और लाल सिंह। शेरसिंह जी की अगली पीढ़ी में मनोहर सिंह, नारायण सिंह। डॉ. नारायण सिंह पांगती जिन उँचाईयों पर हैं, इनका बचपन उतना ही परीक्षादायी रहा है। मिलम में 1944 में जन्मे पांगती जी माइग्रेशन परम्परा के साक्षी हैं और ग्राम चिलकिया (नाचनी से पहले पुल के पास) में बचपन की पढ़ाई के बाद अपने रिश्तेदारों के पास रहकर तेजम के लोधियाबगड़, भैंसखाल, टिमटिया स्कूली शिक्षा लेने लगे। 1962 में मुनस्यारी से हाईस्कूल का प्रथम बैच ;विज्ञान वर्गद्ध के छात्र पांगती जी कक्षा 11 की परीक्षा बेरीनाग से और इण्टर अल्मोड़ा से किया। सन् 1965 में किंक जार्ज मेडिकल कालेज लखनउ से एमबीबीएस किया। सन् 1962 के बाद अपने क्षेत्रा से यह पहले युवा थे जिन्होंने एमबीबीएस किया था। इससे पहले चन्द्र सिंह रावत, जसवन्त सिंह धर्मशक्तू अपने समय के एमबीबीएस किये हुए थे। सन् 1972 में राजकीय चिकित्सा सेवा में आने के बाद 1984 में प्रमोशन पर डिप्टी सीएमओ का कार्यभार ग्रहण किया। अल्मोड़ा में सीएमएस बेस अस्पताल में रहने के बाद नैनीताल फिर 2002 में सेवानिवृत्त डाक्टर साहब ने अपनी चिकित्सा सेवा का लाभ विस्तार रूप में किया। इनके कार्यों में श्रीमती जयवन्ती (जया) पांगती जी का हरक्षण सहयोग आगे बढ़ने में फलीभूत हुआ है। सुपुत्र डॉ.मंयक, सुपुत्री श्रीमती गुन्जन, सुपुत्र- डॉ. भानू अपने कार्यक्षेत्र के अलावा सामाजिक सरोकारों से जुड़े हैं।

पांगती जी के अपने घरेलू राग से ज्यादा सामाजिक आलाप रहे हैं। तभी तो उन्होंने अपने पूज्य पिता का स्मरण करते हुए अनमोल कृति समाज को दी। डा. आर.एस.टोलिया के साथ बार-बार चर्चा करते हुए इन्होंने डॉ.शेरसिंह पांगती को उचकाया कि प्राप्त कुछ दस्तावेजों पर कार्य हो। जोहार मिलन केन्द्र के सहयोग से सन् 2009 में दुर्गा सिटी सेन्टर हल्द्वानी में उस पुस्तक का विमोचन भी हुआ। वह केवल पुस्तक नहीं बल्कि एक ऐसा दस्तावेज है जो इतिहास के रूप में उन यादों को बताता है कि किस परिस्थितियों से हम जुड़े रहे और कैसे थे हमारे बुजुर्ग। इसके अलावा भी डॉ.पांगती की लगन समाज को जोड़ने के रूप में हमेशा से है जो सकारात्मक उर्जा देती है।
डॉ.पांगती अपने बचपन को याद कर कहते हैं- पिता शेरसिंह जी और माता श्रीमती रूकमणी देवी के शैशवकाल में दिवंगत होने पर चाचा लाल सिंह जी और चाची श्रीमती उखा देवी का साया हमारे उपर था। पिता स्व.शेर सिंह पांगती के बारे में बचपन से ही खूब सुना था कि वह तिब्बत में डाकुओं का पीछा करते हुए काश्मीर गये और वहाँ से कई फोटो लाए थे। चिकित्सकीय शिक्षा पूरी कर पांगती जी राजकीय अस्पतालों में कार्यरत थे, एक बार अवकाश में अपने घर मुनस्यारी गये तो एक लिफाफा दिखा जिस पर देवनागिरी लिपि में चाचा जी का नाम-पता लिखा था। इस लिफाफे में 50 पेज का अग्रेजी में लिखा आलेख था। पूछने पर चाचा जी ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व एक जर्मनी नौजवान मुनस्यारी आया था उसने दाज्यू बडे़ भाई स्व.शेर सिंह के बारे में पूछताछ की, उसी ने भेजा है।
यहीं से डॉ. पांगती को पिता जी का वह सूत्र पता चला जो शैशवावस्था में वह पिता के जाने के बाद नहीं जान पाये थे कि उनके पिता कैसे जो थे। लिफाफे में ग्रेपा का आलेख कई बार पढ़ने के बाद पांगती जी ने तय कर लिया कि अपने बुजुर्गों की इस याद को वह संजोयेंगे और शोधर्थी ग्रेपा का धन्यवाद किया कि उसने खोज में उनके पिता के बारे में जानकारी पुष्ट की। डॉ.पांगती ने ने अपनी पत्नी जया जी के साथ निश्चय किया किया कि जर्मनी से आकर ग्रेपा ने जिस कार्य को खोजा उसे सार्वजनिक किया जाए, इसके लिये ग्रेपा और ब्रिटिश लाइब्रेरी से स्वीकृति भी ले ली। इस कार्य में डॉ.शेरसिंह पांगती का योगदान भी रहा।
भारत-तिब्बत व्यापार विषय को लेकर पिघलता हिमालय बराबर रोचक जानकारी देता रहा है। सन् 1941 में कज्जाकी लुटेरों द्वारा तिब्बत में जोहार (भारतीय व्यापारियों) का सामान लूटने तथा व्यापारी शेरसिंह पांगती द्वारा उन लुटेरों का पीछा किये जाने की घटना कम रोचक नहीं है। ग्रेपा के शोध में भी यह कहा गया कि 1980-90 के दशक तक इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी तथा कज्जाकी लुटेरों से पीड़ित व्यापारी जीवित थे। जिनकी सहायता से वह सम्पूर्ण घटनाओं से अवगत हो सका। ग्रेपा ने म्यूनिख यूनीवर्सिटी (जर्मनी) से अपना पंजीकरण करा कर दो-तीन वर्षों तक मुनस्यारी, थल और हल्द्वानी स्थित जोहार के तत्कालीन तिब्बती व्यापारियों से सम्पर्क स्थापित किया। साथ ही धरमशाला (हिमांचल प्रदेश) स्थित म्यूनिख यूनीवर्सिटी (जर्मनी) और ब्रिटेन के इण्डिया आफिस लाइब्रेरी आदि स्थानों से इन कज्जाकियों के सम्बन्ध् में महत्वपूर्ण अभिलेख उपलब्ध् करने में अथाह परिश्रम किया।
इसी शोध प्रबन्ध् का उल्लेख करते हुए हुए डॉ.पांगती बताते हैं- भारत की आजादी से पूर्व अथवा तिब्बत का चीनी प्रशासन के अधीन आने से पहले भारत और तिब्बत दो देशों के इस सीमावर्ती क्षेत्र में निवास करने वालों के बीच सदियों से जो व्यापारिक सम्बन्ध था, उन सम्बन्धें का विश्वसनीय रूप में परिपालन करते हुए ये व्यापारी अपनी बेशकीमती व्यापारिक वतस्तुएं इन तिब्बती मित्रों के पास अथवा बौद्ध मठों में छोड़ आते थे और यह सामान सुरक्षित रहता था। तिब्बती लोग अपने इन भारतीय मित्रों को धेखा देना महान पाप समझते थे परन्तु मध्य एशिया के जिस खानाबदोस समुदाय ने लूटमार करना अपना व्यवसाय बना लिया हो, उनके लिये तिब्बत जैसे असहाय और शान्तप्रिय देश में लूटमार करना कोई असम्भव कार्य नहीं था। यहीं से लूट मचना आरम्भ हुआ।

अगस्त 1941 में इन कज्जाकी लुटेरों ने तिब्बत के उत्तरी पठारी मैदान च्यांग-थांग से लूट शुरू करते हुए कैलास मानसरोवर के निकटवर्ती क्षेत्र में प्रवेश किया। इनके भय से शौका (भारतीय व्यापारियों) ने भी अपना सामान तिब्बती मित्रों के पास रखकर जान उचित समझा। लेकिन कज्जाकी जुटेरे तो सिर्पफ लूट जानते थे। इन्होंने जोहार के 43 व्यापारियों का लगभग 41 हजार रुपये का सामन लूट लिया, जिसमें राम सिंह रतन सिंह नाम के एक व्यापारिक फर्म का सबसे अधिक 13 हजार रुपये का सामान लूटा गया था। इन कज्जाकियों द्वारा लूटा गया सामान वापस प्राप्त करने के लिये इस फर्म के साहसी व्यापारी शेर सिंह पांगती ने कठिनाईयों का सामना करते हुए पीछा किया। बौद्ध धर्म के अनुयायी तिब्बती लोगों को सता रहे कज्जाकियों का आतंक जब अति हो गया था गरतोक के गरपन राज्यपाल ने इनकी रोकथाम व लूटे गये सामान को वापस प्राप्त करने की आशा से काश्मीर सरकार के अध्किारियों से निवेदन किया और स्वयं सेना के साथ पश्चिम की ओर प्रस्थान किया। साथ में जोहार के व्यापारी शेरसिंह पांगती भी थे।
कज्जाकियों ने काश्मीरी सेना की टुकड़ी पर हमला कर दिया परन्तु उन्हें पीछा हटना पड़ा। इस बीच ब्रिटिश रेजीडेन्ट से काश्मीर सरकार को पत्र प्राप्त हुआ कि भारत सरकार कज्जाकियों की गतिविधियों की पूर्ण जानकारी के बिना तिब्बत की सीमा के अन्दर अपनी सैनिक टुकड़ी भेजने की अनुमति नहीं देना चाहती है। इसके लिये शीत के दिनों में लद्दाख में वार्ता की जा सकती है। अक्टूबर में चार जोहारी व्यापारी चुसूल पहंुचं। शिविर में 40 सिपाहियों ने दमचौक के लिये प्रस्थान किया। चमचौक पहुंचकर उन्हें वहाँ की टुकड़ी को मजबूत करना था।
कज्जाकियों की ये कहानी बहुत लम्बी और रोचक है (फिर कभी)। फिलहाल पांगती जी की यादों को सलाम करते हुए बताते हैं- कज्जाकियों द्वारा लूट कर ले जाये गये सामान को प्राप्त करने के लिये शेर सिंह पांगती की भाँति गरतोक का गरपन भी तिब्बत सेना के साथ दमचौक तक गया था परन्तु कज्जाकियों के आत्मसमर्पण करने के पश्चात भी जब उन्हें कुछ भी प्राप्त न हो सकता तो मन मारकर वापस लौटते समय गरपन ने कज्जाकियों द्वारा छोड़े गये 600-700 भेड़-बकरियाँ एक आना 12 आने की दर से जोहार के व्यापारी मेघ सिंह, मानी सिंह को बेची, जो जोहार पहँुचने तक 400 ही रह गई थी। शेर सिंह पांगती ने पं.गोविन्द बल्लभ पन्त सहित तमाम बड़े नेताओं से मिलकर लूटे सामान को वापस लाने का यत्न किया लेकिन असेम्बली के 16 फरवरी 1962 की वार्ता में भाग लेते हुए गोविन्द वी देशमुख के प्रश्न के आधार पर जिन व्यक्तियों के सामान की क्षति हुई, उसके भुगतान के लिये सरकार निश्चय कर चुकी थी। परन्तु औलफ कारो ने घोषणा की कि कज्जाकियों ने जिन व्यक्तियों का सामान भारत से बाहर चुराया है, उन्हें किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति नहीं दी जा सकती है। सीध सा अर्थ था कि तिब्बत यानी देश से बाहर लूट के लिये तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार ने किसी प्रकार अपना उत्तरदायित्व नहीं समझा। सवाल आज भी बना हुआ है जिसे एक जोहारी व्यापारी ने लड़ा था।

पहाड़ की सुरसाम्राज्ञी बीना तिवारी

रतन सिंह किरमोलिया
कुमाउंनी गीत संगीत एवं गायकी की सुर साम्राज्ञी बीना तिवारी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वह कुमाउंनी और गढ़वाली गीतों की उस जमाने की गायक कलाकार रही हैं जब आकाशवाणी लखनऊ से इनकी शुरुआत हो ही रही थी। यह करीब सन् 1963 के शुरुआती दिनों की बात है। इससे पूर्व कुमाउंनी और गढ़वाली गीतों के प्रसारण की आकाशवाणी लखनऊ से कोई व्यवस्था नहीं थी। हाँ,ं स्थानीय मेलों एवं कौतिकों में लोकगीत गाए एवं बजाए जाते थे। हालांकि उस समय कुमाउंनी और गढ़वाली के कई गीतकार गीतों की रचना में लगे हुए थे। कुछ स्वयं गाते भी थे।
कुमाउंनी और गढ़वाली लोकगीतों के हिमायती कुछ प्रबुद्ध विद्वानों ने आकाशवाणी लखनऊ से ‘उत्तरायण कार्यक्रम’ नाम से इसकी शुरुआत की। इसकी जिम्मेदारी जयदेव शर्मा ‘कमल’ और जीतसिंह जड़धारी को सौपी गई। ये दोनों गढ़वाली में कार्यक्रम करते थे और कुछ कुमाउंनी के गीत बजाया करते थे। कुमाउंनी के लिए कम्पीयर के रूप में बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ को लाया गया। 7 जनवरी 1963 से वे उत्तरायण कार्यक्रम से जुड़ गए। तब कुमाउंनी गढ़वाली गीतों को गाने वाले गायक कलाकारों को खोजा जाने लगा। कुमाउंनी लोकगीत गाने के लिए बीना तिवारी का चयन किया गया। बाकायदा स्वर परीक्षा के बाद ‘बी’ हाईग्रेड कलाकार के रूप में उनका चयन किया गया। मैं समझता हूँ लोक भाषा कुमाउंनी के गीत गाने वाली तत्कालीन बी हाईग्रेड कलाकार के रूप में वह प्रथम महिला गायिका रही हैं। उन्होंने कुमाउंनी के साथ साथ गढ़वाली के भी कई लोकगीत गाए हैं। आकाशवाणी लखनऊ के उत्तरायण कार्यक्रम में उनके गाए गीतों के प्रसारण के बाद श्रोताओं से उन्हें जो प्यार और वाहवाही मिली वह काबिले तारीफ रही।
बीना तिवारी का जन्म पिता कृष्णचन्द्र और माता मोहिनी देवी के घर 14 जनवरी 1949 को लखनऊ में हुआ। उनका मूल पैतृक गाँव ज्योली अल्मोड़ा है। उनकी शिक्षा दीक्षा लखनऊ में ही हुई। उन्होंने बीए, संगीत निपुण तक की शिक्षा भातखण्डे संगीत महाविद्यालय लखनऊ से प्राप्त की। उनके संगीत एवं गायन में महारत हासिल करने में गोविन्द नारायण नातू और कृष्णराय की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में कुछ समय के लिए बेगम अख्तर और बिरजू महाराज के सानिध्य में रह कर भी उन्हें संगीत एवं गायन सीखने का अवसर मिला।
उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ से जुड़कर कुमाउंनी गढ़वाली गीतों के अलावा हिन्दी के गीत गजल एवं भजन भी गाए। आकाशवाणी लखनऊ के अलावा आकाशवाणी रामपुर, नजीबाबाद और अल्मोड़ा केन्द्रों से भी उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है।
प्रतिष्ठित गीतकारों में चारुचन्द्र पाण्डेय, शेरसिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, गोपालदत्त भट्ट, हीरासिंह राणा, बृजेन्द्र लाल साह, बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’, चन्द्रसिंह राही, केशव अनुरागी, गिरीश तिवारी ‘गिर्दा ’ आदि के गीतों का अपने सुरीले कण्ठ एवं मोहक स्वर में गाकर स्वयं भी लोकप्रियता हासिल की और गीतकारों को भी अमर कर दिया।
उस समय के इनके गाए गीत काफी चर्चित एवं लोकप्रिय रहे। उनमें जैसे- झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी, ओ परुवा बौज्यू, दे देवा बाबा जी कन्या को दान, बाट लागी बर्यात चेली, पारा भीड़ा जाणियां बटौव रे, बुरूंशी का फूलों को कुमकुम मारो, गिरधारी तेरो अति चकान, लोरी गीत और रामी बौराणी जैसे अनेकों गीतों को आपने स्वर दिया। जो आज भी सराहे जाते हैं।
आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित कई धारावाहिकों में भी आपने काम किया। बर्ष 2022 की गणतंत्र दिवस की बीटिंग रिट्रीट परेड हेतु ’‘झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी.!’ की धुन को चुना गया था। आपने 6 बर्षों तक मोतीलाल नेहरू कन्या इण्टर कालेज लखनऊ में और 19 बर्षों तक दयावती मोदी अकादमी रामपुर उ.प्र. में संगीत विषय का अध्यापन किया।
देश की नामी गिरामी कई संस्थाओं द्वारा समय-समय पर आपको करीब डेढ़ दर्जन पुरस्कारों/सम्मानों से नवाजा गया परन्तु आश्चर्य की बात है कि सरकारी स्तर पर अद्यतन आपको न संगीत नाटक अकादमी ने याद किया, न उत्तराखण्ड संस्कृति विभाग ने और न उत्तराखण्ड भाषा संस्थान ने ही आपकी कोई सुध ली। संगीत एवं गायन के क्षेत्र में इनके अमूल्य योगदान का कहीं कोई मूल्यांकन नहीं हो पाया। यहाँ तक कि वयोवृद्ध कलाकारों को मिलने वाली पेंशन से भी इन्हें महरूम रहना पड़ रहा है। उनका कहना है कि कई बार आवेदन करने के बावजूद किसी ने भी संज्ञान नहीं लिया। इस सम्बन्ध में उनका आगे कहना है कि वर्तमान में’ अपनी-अपनी और अपनों की दौड़’ में उम्र की इस दहलीज में किससे कहूं और क्या कहूं। अब तो मन खिन्न हो चुका है और अब तमन्ना भी नहीं रह गई है।
इस लेख के माध्यम से मेरा उत्तराखण्ड संस्कृति विभाग से अनुरोध है कि कम से कम उन्हें जीवन निर्वाह के लिए पेंशन तो अनुमन्य करवा देवें। उनके द्वारा लोकगीत संगीत क्षेत्रा में दिए गए करीब 50 बर्षों के अमूल्य योगदान का मूल्यांकन का उत्तराखण्ड सरकार को संज्ञान लेना चाहिए।

चायना वार के बाद तेजम प्रमुख केन्द्र था

चन्दन सिंह रावत से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
बात और चीजों को समझना भी कुशलता है। समझने का फेर तकलीफ देता है। कई बार अवरोध् दिखने वाली बातें हमारे विकास में सहायक होती हैं। विकास और विनास का यह क्रम चलता रहता है। इस प्रकार के तर्कों से जूझते हुए अपना रास्ता बनाने वाले तेजम के चन्दन सिंह रावत से आज की खास बातचीज है। जिसमें वह थल-मुनस्यारी मुख्य मार्ग पर स्थित ‘तेजम’ सहित रोचक जानकारियों से अवगत करा रहे हैं।
इससे पहले इनके बारे में जानते हैं- मिलम में एक हुए खड़क सिंह रावत। अपने जमाने के इण्डो-तिब्बत व्यापार के प्रमुख व्यक्तियों में थे। गीता, रामायण का ज्ञान और उसका वाचन करने वाले खड़क सिंह जी वैद्यगिरी भी कर लेते थे, जिस कारण ‘खड़कू गीता’ या ‘गीता’ नाम से पहचान मिल गई। आयुर्वेद के जानकार होने के कारण यह इलाज भी कर देते। व्यापार का जमाना था और बताते हैं तब दिल्ली में कहीं इनका सम्पर्क था जिससे यह दवाई की खुराक मंगवा लिया करते थे। स्थानीय स्तर पर भी जड़ी-बूटी का प्रयोग करते। र्ध्मपरायण होने के कारण इन्होंने अपने पुत्रों के नाम- देवराम सिंह, हरीराम सिंह, दयाराम सिंह, श्रीराम सिंह रखा। आज भी तेजम में इनके कुनबे की पहचान ‘गीता’ या ‘खड़कू गीता’ का परिवार के रूप में है। इन चार भाईयों में देवराम सिंह रावत के सुपुत्र हुए- प्रहलाद सिंह और चन्द्रमोहन सिंह। प्रहलाद सिंह के सुपुत्र हुए- चन्दन सिंह, डॉ. प्रद्युमन सिंह, लक्ष्मण सिंह और ईश्वर सिंह। इसी प्रकार चन्द्रमोहन रावत जी के हुए गजेन्द्र सिंह और गम्भीर सिंह रावत। श्री चन्दन सिंह रावत का जन्म 1952 में मिलम में हुआ। साकेत कालोनी हल्द्वानी में निवासरत श्री रावत और श्रीमती जमुना रावत की विवाहित सुपुत्री दीपिका और नीलिमा के अलावा सुपुत्र- नगेन्द्र रावत हैं।
मिलम में जन्मे श्री चन्दन सिंह बताते हैं सन् 1961 तक तो माइग्रेशन स्कूल व्यवस्था में पढ़ाई की व्यवस्था थी। जोहार घाटी में कक्षा 5 तक ही माइग्रेशन वाले स्कूल सीमित थे। घरों की तरह ही स्कूल भवन भी पक्के पत्थरों के बने थे, जोहार घाटी की कई विभूतियां इन्हीं स्कूलों की देन हैं। बाद में तेजम में सरकारी प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल खुले उसमें लम्बे समय तक घास के छप्पर वाली छत थी, जिसमें कक्षाओं का संचालन होता था। उन झोपड़ियों में ही कुर्सी-मेज सब होता। बकायदा टीचर्स क्वार्टर भी बने थे। समर्पित गुरुजनों की देखरेख में सबको अवसर मिले। स्कूल बहुत कम थे और प्राइमरी परीक्षा का सेन्टर भैंसकोट था जबकि कक्षा आठ बोर्ड का सेन्टर बेरीनाग में हुआ करता था। हम साथी लोग मिलकर मनकोट में कमरा लेकर रहते और अपने गांव से ही खाना बनाने वाले साथी भी साथ ही ले जाते थे। चन्दन सिंह जी के पढ़ाई का सिलसिला तेजम, मुनस्यारी और पिफर अल्मोड़ा डिग्री कालेज रहा।
इनके माइग्रेशन के गाँव का विवरण इस प्रकार है- मल्ला जोहार क्षेत्रा में मिलम, बार्डर पास, फिर मुनस्यारी क्षेत्र में जलथ, उसके बाद तल्ला जोहार की घाटियां। तेजम जहाँ 1962 के बाद स्थाई तौर पर रहना पड़ा। स्थाई तौर पर तेजम आने वाले परिवार जो प्रकृति से जुड़े थे, अतीत की कई चीजें खोई तो कई चीजें प्राप्त कीं। आज भी इनके जेहन में अपनी संस्कृति के वह दिन बसे हैं।
वह बताते हैं भारत-चीन युद्ध के बाद हालात बदलने लगे। तब तक तेजम तक ही गाड़ी आती थी। चायना वार के बाद 1964 के आसपास तेजम प्रमुख केन्द्र था। उस समय के हिसाब से इसका बाजार भी था और मुनस्यारी व दूरस्थ क्षेत्र से जिसने भी मोटरवाहन से यात्रा करनी होती वह तेजम आकर रुकता। इससे पहले गाड़ी रुकने का स्टेशन थल और शामा में रहा। चायना हमले के बाद रास्ते बनने लगे, रोड कटिंग में समय लगा। रावत जी बताते हैं- पहले जमीदारी प्रथा में हमारी काफी भूमि थी और भूमि जोतने वाले ‘अधेली’ यानी फसल का हिस्सा उनके पास पहुंचा जाते थे। बचपन में देखा है- पीठ में लादकर या घोड़े के द्वारा अनाज घर तक पहुंचता था। जमीदारी उन्मूलन में भूमि चली गई। एक ओर युद्ध में व्यापार थम गया और जमीदारी उन्मूलन में भूमि छिन गई तो स्थिति डामाडोल हो गई। तब तक पढ़ाई करने वाले भी व्यापार में ही अपना समय लगाते थे। सन् 1967 में जब क्षेत्र के लोगों को भोटिया जनजाति घोषित किया गया तो परिस्थिति देखते हुए नौकरी के हिसाब से पढ़ने लगे। उन दिनों में तो किसी प्रकार की जानकारी भी नहीं मिल पाती थी। कोई साथी बाहर जाकर सुनता कि अमुक जगह भर्ती है या पद रिक्त है तो एक-दूसरे को बताते थे।
अल्मोड़ा से बीएससी, एम.ए.अर्थशास्त्र के अलावा बीएड करने वाले चन्दन सिंह जी ने 1975 में बैंकिंग सेवा शुरु की। स्टेट बैंक बागेश्वर में प्रथम नियुक्ति के बाद जुलाई 2012 में मैनेजर के रूप में हल्द्वानी से सेवानिवृत्त होकर अपने परिवार के साथ समय व्यतीत कर रहे हैं। श्री रावत सेवानिवृत्त होने के बाद उत्तराखण्ड ग्रामीण बैंक हल्द्वानी में 5 साल वित्तीय जागरूकता केन्द्र भी अपनी सेवाएं देते रहे। इससे सम्बन्ध्ति जानकरी व जागरुकता के लेख पिघलता हिमालय में उनके द्वारा प्रकाशित करवाए जाते थे। समाज में चल रही उथल-पुथल को बारीकी से जानने वाले रावत जी अपने बचपन के दिनों से तुलना करते हैं- तेजम में बचपन के खेल कंचे, कबड्डी, गिल्लीडंडा था। गर्मियों में साथियों संग जाबुका नदी में जी भर तैरना फिर कुछ देर के लिये किनारे पत्थर, रेते पर बैठ कर ध्ूप का आनन्द लेने की प्रक्रिया ये आज भी हम सभी पुराने साथियों को रोमांचित कर जाता है। प्रकृति के साथ रमने वाले कई अच्छे तैराक भी बने। वह कहते हैं- जिन बातों को आज परेशानी के रूप में देखा व समझा जा रहा है वह तो आदत में सुमार था। परिस्थितियों के अनुसार बच्चे-बूढ़े अपने समय को जी रहे थे। ये हमारे समझने का पफेर है। क्योंकि जिन्होंने परेशानी नहीं देखी होती है वह कठिन समय में घबरा जाते हैं। समय के साथ बदलाव होता चला जाएगा लेकिन असली धर उसी में होगी जो ईमानदार होगा। सचमुच प्रकृति के संघर्षों को उत्सव रूप में देख चुके रावत जी और इनके जैसे और भी सज्जन हैं, इनकी क्षमता और देशभक्ति की भावना का सकारात्मक प्रभाव समाज में हमेशा रहता है।

पुंगराउ घाटी में जब मन्दिर स्थापना हुई तभी से कार्की, पाठक, वृजवालों को इसका आंगन मिला है

भीमसिंह वृजवाल-श्रीमती तुलसी देवी से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
पुंगराउ घाटी ‘पांखू’ में न्याय की देवी कोटगाड़ी की मान्यता विश्वभर में है। कोकिला माता के नाम से भी इनके दरबार को जाना जाता है। कोटगाड़ी के इसी आंगन में कार्की, पाठक, वृजवालों का खाल (आंगन )है। आज के अंक में इस घाटी के वयोवृद्ध दम्पत्ति से विशेष भेंटवार्ता प्रस्तुत है। 92 वर्षीय भीम सिंह वृजवाल और 88 वर्षीय तुलसी देवी के साथ नई-पुरानी अनगिनत यादें जुड़ी हैं। और जिस प्रकार का जीवन इन्होंने देखा है वह पहाड़ की कठिन कही जाने वाली दिनचर्या के साथ अपनी संस्कृति की पूरी लहर सी है।
वृजवालों के परिवार अपने यात्रा प्रसंग में माइग्रेशन के दौरान पुंगपाउ घाटी में आए और यहीं के होकर रह गये। इस घाटी के नौ गांवों में यह इसलिये फैले क्योंकि इनके साथ भेड़ बकरियां जानवरों के लिये काफी खुला स्थान चाहिए था।
अब तो कोटगाड़ी मन्दिर तक शानदार मोटर रोड है और ग्रामों में भी सम्पर्क मार्ग हो चुके हैं, उस दौर को याद कर सोच पड़ जाते हैं जब एकदम बीहड़ दुर्गम जगह रही होगी। भीमसिंह जी कहते हैं- कोटगाड़ी मन्दिर की स्थापना हुई होगी, हमारे बुजुर्ग उसी दौर से से यहाँ आते रहे हैं और यहीं हमारा आंगन है। तभी से एक मवासा कोटगाड़ी, एक सनेती, एक चनोती, फल्याटी, तोराथल इन ग्रामों में रहे हैं। चूंकि जानवरों के लिये चारागाह की आवश्यकता होती है, तब वृजवाल भाई अलग-अलग जगहों पर रहने गये थे। मौसम चक्र अनुसार माइग्रेशन में बिल्जू से आने वाले परिवार मुनस्यारी, दुम्मर के बाद पुंगराउ घाटी आया करते थे। तिब्बत व्यापार तो बुजुर्गों का नियत था ही। फिर यहाँ से व्यापार के लिये हल्द्वानी, काशीपुर, रामनगर भी जाना होता था।
जीवन के उत्तरार्द्ध में वृजवाल दम्पत्ति अपने ग्राम फल्याटी के उन दिनों की याद बताते हैं जब घरेलू सामान लेने पैदल चौकोड़ी जाना होता था। हस्तशिल्प की माहिर श्रीमती तुलसी देवी दन-कालीन व पंखी बनाने जिस प्रकार की उस्ताद रही हैं, महिलाओं का हुजूम इन्हें देखने उमड़ता था। श्री वृजवाल बताते हैं कि उन्होंने पहली बार सन् 1955 में घोड़ों के साथ गरुड़ जाकर गाड़ी देखी थी और उनके बड़े बालक गिरीश ने जब चौकोड़ी में पहली बार गाड़ी देखी वह डरकर भागने लगा। श्री गिरीश वृजवाल भी अपने बचपन की इस घटना को हमेशा याद करते हुए उन दिनों का स्मरण करते हैं।
भीमसिंह जी अपने बड़े भाई प्रेम सिंह जी के साथ एक बार तिब्बत व्यापार के लिये भी गये। रोमांचक और कठिनाई भरी उस यात्रा में तीन धूरा चोटी जहाँ जान गंवाने में भी देर नहीं लगती थी। उंटाधूरा, जयन्ती, किंगरी-बिंगरी जिसे किसी भी रूप में एक दिन में पार करना अनिवार्य था। जिसे हम डेथ पांइट भी कह सकते हैं। एक ही दिन में पार कर लिया गया। उसी बीच गंगपानी से किंगरी बिंगरी, दुंग, छिरतिंग, चिलमता, मानीथंगा, खिमलिंग, गुरगम, मिसर, बम्म्बाडोल ज्ञानिमा तक रास्ते पड़ाव दुर्गम बर्फीले रास्तों का सामना करना पड़ा। किंगरी बिंगरी पहुंचकर कैलास पर्वत दर्शन का मनोरम दृष्य दिखाई दिया। सभी गर्खाओं के मित्र की तरह बृजवालों के मित्र खिमलिंग नामक स्थान पर डेरा डाले थे। चंवर गाय के बालों के बनाया तम्बू जिसमें अत्यध्कि गरम रहता था।
अब थोड़ा सा इस परिवार के बारे में जान लेते हैं- एक थे लालसिंह बृजवाल। इनके सुपुत्र हुए जसौद सिंह फिर इनकी अगली पीढ़ी के हुए- हीरा सिंह, गोवर्द्धन सिंह, प्रेम सिंह और भीमसिंह। जसौद सिंह की बाद की पीढ़ी का डेरा पुंगराउ घाटी पर पूरी तरह हो गया। हालांकि उससे पहले भी व्यापार के सिलसिले में इनका आना-जाना बराबर था। जसौद सिंह जी की थराली, नारायणबड़ग में दुकान भी थी। सेठ जी के इस फैले हुए कारोबार में हाथ बंटाने परिवार सहित अन्य भी जुटते थे।
श्री भीमसिंह जी बताते हैं उनी कारोबार में भेड़ का काला उन गढ़वाल जाता था क्योंकि वहाँ महिलाओं के बनने वाले वस्त्रों में इसकी मांग थी और सफेद उन बागेश्वर मेले में जाता था। बागेश्वर गांधी आश्रम के प्रबन्धक शान्ति लाल थे। जिस प्रकार जोहार मुनस्यार में उनी कुटीर उद्योग धन्धे थे उनका सामान दन, कम्बल, कालीन, पंखी जौलजीवी मेले में जाता था, उसी प्रकार पांखू से के घरेलू कुटीर उद्योग से सामान बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में जाता था।
अपनी संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को जीवनभर जीने वाले वृजवाल दम्पत्ति के पास अनगिनत यादें हैं। इनके सुपुत्र श्री गिरीश बृजवाल श्रीमती भवानी बृजवाल और श्री प्रकाश बृजवाल श्रीमती सरस्वती बृजवाल अपने गाँव-घर की उन पुरानी यादों को समृतियों में सहेजे हुए हैं। तभी उनका मन पुंगराउ घाटी की उन वादियों में घुमड़ता है और कोटगाड़ी दरबार के दर्शन के अलावा अपने उस स्थान को संवारने में दृढ़ हैं।

हुणिया मित्र अपने जानवरों के साथ आ रहे थे तभी नदी में छलांग लगा दी

नेत्र सिंह गनघरिया से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
अपनी संस्कृति को बचाने के लिये केवल जमावड़ा करना पर्याप्त नहीं है, इसके लिए जागरूकता ही उपाय है। जागरूकता से ही संस्कृति बचती है। इसी धारणा के साथ चिन्तन-मनन और व्यवहार में लाने वाले डॉ.नेत्र सिंह गनघरिया के साथ बातचीत पर आधारित है पिघलता हिमालय का यह अंक। बातचीत में रोचक जानकारियों से पहले श्रीमान गनघरिया के बारे में जान लेते हैं- इतिहास बताता है कि गढ़वाल से इनकी आवत हुई। इनके पूर्वज कुंवर राजपूत थे। परगना सगरी ग्राम बधान में रहने वाले वाले धनु के दो लड़के माछू और धौलिया जो नन्दादेवी के उपासक थे। दोनों रहते हुए पूजा-पाठ में रत रहते थे लेकिन एक व्यक्ति उन्हें बराबर व्यवधान करता था, उनकी पूजा में बिघ्न करता। ऐसे में उन कुंवर भाईयों ने धनुष उठाया और उसे मार डाला। पकड़े जाने भय से राजा बाजबहादुर के समय यह भाई जोहार घाटी के मिलम में आ गए। मिलम में रहते हुए कुछ समय ही इन्हें हुआ था, मिलम वासियों ने कहा- आप पांछू जाकर रहो। इसके बाद एक भाई धौलिया बिल्जू गया जिन्हें ‘दास्पा’ और एक भाई गनघर गया जिन्हें ‘गनघरिया’ कहा गया। स्थान के अनुसार कुल नाम हुआ करता था। ब्रिटिश काल में कुमाउं के द्वितीय कमिश्नर विलयम ट्रेल जब अपने दौरे में इस सीमान्त क्षेत्र में आए तो उन्होंने गनघर को आबाद करने के लिये प्रोत्साहित किया। मौसम के हिसाब से माइग्रेसन करने वाले परिवार ने गनघर, घोरपट्टा और थाला में अपने रहने की व्यवस्था की। चौकोड़ी से काण्डा-बागेश्वर जाते समय हुदुमधार के पास है- थाला। पहाड़ के पीछे ढलान पर यह ग्राम गनघरिया परिवारों ने अपने लिये उपयुक्त माना और यात्रा पर निकलते समय अपने जानवरों के साथ यहीं डेरा डालने लगे। और अक्टूबर माह से मार्च तक थाला में रहने लगे। थाला में अभी हाल भी कुछ परिवार रहते हैं।
गनघरियाओं के इसी कुनबे में एक हुए- हरमल सिंह। इनके पुत्र हुए- बाला सिंह, कुन्दन सिंह, विशन सिंह, महिमन सिंह और गोकर्ण सिंह। परिवार की शाखाएं काफी फैली हैं। फिर बाला सिंह के सुपुत्र हुए- नेत्र सिंह और राजेन्द्र सिंह। इनकी अगली पीढ़ी की बात करें तो डॉ.नेत्रसिंह के पुत्र- सुजीत और पुत्री नीता हैं जबकि श्रीमान राजेन्द्र सिंह की पुत्रियां किरन, पूजा और पुत्र पंकज सिंह हैं।
पारिवारिक तानेबाने के बाद डाक्टर गनघरिया साहब के बचपन की ओर झांके तो पता चलता है 22 दिसम्बर 1950 को थाला में इनका जन्म हुआ। पधानचारी के परिवार में जन्म लेने वाले नेत्र सिंह, राजेन्द्र सिंह का लालन-पालन साधारण पृष्ठभूमि में हुआ। बचपन की पढ़ाई कमेड़ीदेवी से करने के बाद यह मुनस्यारी चले गये। बचपन के दिनों को याद करते हुए नेत्र सिंह जी बताते हैं- पढ़ने के साथ पाटी लेकर जाते और पाटी में घोटा लगाते हुए उसे दूसरे साथियों की पाटी से ज्यादा चमकदार बनाने का सब साथियों के लिये अनमोल क्षण होता। विद्यालय में छुट्टी से पहले गिनती, पहाड़े जोर-जोर से समूह में पढ़ते, जो सबको याद हो जाता। मुनस्यारी इण्टर कालेज के बाद अल्मोड़ा से बीएससी इन्होंने की और एमएससी करने नैनीताल चले गये। इस बीच कानपुर में एमबीबीएस करने के बाद पैरामिलीट्री फोर्स, बीएसएपफ में चिकित्साधिकारी, सहायक कमाण्डेंट के पद पर इनका चयन हुआ लेकिन अपनी उन मीठी यादों के साथ हमेशा अपने संस्कारों में बंध्े रहे। इन्होंने 31 साल तक फौजी परिवेश में विभिन्न जगहों, पदों पर अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा एवं सफलता पूर्वक निर्वहन किया। इसके लिये इन्हें 26 जनवरी 2003 में राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया। झेमू हरपाल राठ में गोविन्द सिंह पांगती की सुपुत्री तारा देवी से इनका विवाह हुआ। श्रीमती तारा भी सांगीतिक और साहित्यक अभिरुचि रखती हैं।
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित डॉ. एन.एस.गनघरिया को बीएसएफ ग्वालियर की अकादमी में कम्पोजित अस्पताल में सेवा का अवसर मिला। पूर्वात्तर में अरुणाचल, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम सहित तमाम जगह इन्हें सेवा के दौरान जाने का अवसर मिला। बांग्लादेश सीमापर पर सिलचर में इनकी पहली पोस्टिंग रही। अपनी पूरी सेवा में उत्कृष्ट कार्यों के बाद जनवरी 2011 में सी.आई.एस.एफ. के निदेशक मेडिकल के पद से सेवानिवृत्त होकर इन्होंने हल्द्वानी में अपने परिवार के साथ रहना तय किया और जिस स्थान पर यह रहते हैं उसे हिमालय कालौनी के नाम से जाना जाता है। अपनी कालौनी को व्यवस्थित रूप देने से लेकर अपने मूल ग्राम तक की स्थितियों पर चिन्तनशील रहने वाले एन.एस.गनघरिया कहते हैं- ‘हमारा ग्राम गनघर नैसर्गिक सुन्दरता से परिपूर्ण है। इसके उत्तर पश्चिम में नन्दादेवी है। वहीं पास पांछू गाढ़ का मनोरम दृश्य दिखता है। दक्षिण में मापा और पूर्व में बिल्जू ग्राम है। प्राकृतिक रूप से इसकी सीमाएं निर्धारित हैं। अब बुर्फू से गनघर ग्राम तक प्रधानमंत्रा ग्रामीण सड़क योजना के अन्तर्गत सड़क बन रही है। अब मुनस्यारी से गनघर जाना आसान हो जाएगा। अपनी पुरानी यादों का जोरदार किस्सा वह बताते हैं- ‘‘तिब्बत से आने वाले हुणिया मित्रों का दल आ रहा था और हम लोग गनघर से देख रहे थे, पाछू गाड़ पर अस्थायी पुल से हुनिया लोग अपने हुनकारा के साथ आ रहे थे अचानक एक भेड़ ने पाछू गाड़ छलांग लगा दी, उसके बाद एक के बाद एक भेड़ छलांग लगाने लगे। गनघर से गये युवकों ने नदी में डूब चुकी भेड़ों को निकाला।’ गनघर और अपने बुजुर्गों से जुड़ी यादों को चिरस्थाई रखने के लिये इन्होंने हाल ही में माँ नन्दादेवी गनघर धार्मिक ट्रस्ट को बनाया है। इसका उद्देश्य अपनों को जोड़ने की पहल सहित पर्यावरण संरक्षण है। गनघर में नाग मन्दिर भी है जहाँ नाग देवता को पूजा जाता है। गोरखनाथ मन्दिर सहित स्थानीय शक्तियों के मन्दिर हैं।
समय के साथ बदलाव होता रहता है लेकिन समय के साथ अपनी धरोहरों को बचाए रखने की शानदार पहल करने वाले डॉ.गनघरिया अपने काज में सपफल हों यही कामना है।

चायना वार के बाद तेजम प्रमुख केन्द्र था

चन्दन सिंह रावत से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
बात और चीजों को समझना भी कुशलता है। समझने का फेर तकलीफ देता है। कई बार अवरोध दिखने वाली बातें हमारे विकास में सहायक होती हैं। विकास और विनास का यह क्रम चलता रहता है। इस प्रकार के तर्कों से जूझते हुए अपना रास्ता बनाने वाले तेजम के चन्दन सिंह रावत से आज की खास बातचीज है। जिसमें वह थल-मुनस्यारी मुख्य मार्ग पर स्थित ‘तेजम’ सहित रोचक जानकारियों से अवगत करा रहे हैं।
इससे पहले इनके बारे में जानते हैं- मिलम में एक हुए खड़क सिंह रावत। अपने जमाने के इण्डो-तिब्बत व्यापार के प्रमुख व्यक्तियों में थे। गीता, रामायण का ज्ञान और उसका वाचन करने वाले खड़क सिंह जी वैद्यगिरी भी कर लेते थे, जिस कारण ‘खड़कू गीता’ या ‘गीता’ नाम से पहचान मिल गई। आयुर्वेद के जानकार होने के कारण यह इलाज भी कर देते। व्यापार का जमाना था और बताते हैं तब दिल्ली में कहीं इनका सम्पर्क था जिससे यह दवाई की खुराक मंगवा लिया करते थे। स्थानीय स्तर पर भी जड़ी-बूटी का प्रयोग करते। धर्मपरायण होने के कारण इन्होंने अपने पुत्रों के नाम- देवराम सिंह, हरीराम सिंह, दयाराम सिंह, श्रीराम सिंह रखा। आज भी तेजम में इनके कुनबे की पहचान ‘गीता’ या ‘खड़कू गीता’ का परिवार के रूप में है। इन चार भाईयों में देवराम सिंह रावत के सुपुत्र हुए- प्रहलाद सिंह और चन्द्रमोहन सिंह। प्रहलाद सिंह के सुपुत्र हुए- चन्दन सिंह, डॉ. प्रद्युमन सिंह, लक्ष्मण सिंह और ईश्वर सिंह। इसी प्रकार चन्द्रमोहन रावत जी के हुए गजेन्द्र सिंह और गम्भीर सिंह रावत। श्री चन्दन सिंह रावत का जन्म 1952 में मिलम में हुआ। साकेत कालोनी हल्द्वानी में निवासरत श्री रावत और श्रीमती जमुना रावत की विवाहित सुपुत्री दीपिका और नीलिमा के अलावा सुपुत्र- नगेन्द्र रावत हैं।
मिलम में जन्मे श्री चन्दन सिंह बताते हैं सन् 1961 तक तो माइग्रेशन स्कूल व्यवस्था में पढ़ाई की व्यवस्था थी। जोहार घाटी में कक्षा 5 तक ही माइग्रेशन वाले स्कूल सीमित थे। घरों की तरह ही स्कूल भवन भी पक्के पत्थरों के बने थे, जोहार घाटी की कई विभूतियां इन्हीं स्कूलों की देन हैं। बाद में तेजम में सरकारी प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल खुले उसमें लम्बे समय तक घास के छप्पर वाली छत थी, जिसमें कक्षाओं का संचालन होता था। उन झोपड़ियों में ही कुर्सी-मेज सब होता। बकायदा टीचर्स क्वार्टर भी बने थे। समर्पित गुरुजनों की देखरेख में सबको अवसर मिले। स्कूल बहुत कम थे और प्राइमरी परीक्षा का सेन्टर भैंसकोट था जबकि कक्षा आठ बोर्ड का सेन्टर बेरीनाग में हुआ करता था। हम साथी लोग मिलकर मनकोट में कमरा लेकर रहते और अपने गांव से ही खाना बनाने वाले साथी भी साथ ही ले जाते थे। चन्दन सिंह जी के पढ़ाई का सिलसिला तेजम, मुनस्यारी और फिर अल्मोड़ा डिग्री कालेज रहा।
इनके माइग्रेशन के गाँव का विवरण इस प्रकार है- मल्ला जोहार क्षेत्र में मिलम, बार्डर पास, फिर मुनस्यारी क्षेत्र में जलथ, उसके बाद तल्ला जोहार की घाटियां। तेजम जहाँ 1962 के बाद स्थाई तौर पर रहना पड़ा। स्थाई तौर पर तेजम आने वाले परिवार जो प्रकृति से जुड़े थे, अतीत की कई चीजें खोई तो कई चीजें प्राप्त कीं। आज भी इनके जेहन में अपनी संस्कृति के वह दिन बसे हैं।
वह बताते हैं भारत-चीन युद्ध के बाद हालात बदलने लगे। तब तक तेजम तक ही गाड़ी आती थी। चायना वार के बाद 1964 के आसपास तेजम प्रमुख केन्द्र था। उस समय के हिसाब से इसका बाजार भी था और मुनस्यारी व दूरस्थ क्षेत्र से जिसने भी मोटरवाहन से यात्रा करनी होती वह तेजम आकर रुकता। इससे पहले गाड़ी रुकने का स्टेशन थल और शामा में रहा। चायना हमले के बाद रास्ते बनने लगे, रोड कटिंग में समय लगा। रावत जी बताते हैं- पहले जमीदारी प्रथा में हमारी काफी भूमि थी और भूमि जोतने वाले ‘अध्ेाली’ यानी फसल का हिस्सा उनके पास पहुंचा जाते थे। बचपन में देखा है- पीठ में लादकर या घोड़े के द्वारा अनाज घर तक पहुंचता था। जमीदारी उन्मूलन में भूमि चली गई। एक ओर युद्ध में व्यापार थम गया और जमीदारी उन्मूलन में भूमि छिन गई तो स्थिति डामाडोल हो गई। तब तक पढ़ाई करने वाले भी व्यापार में ही अपना समय लगाते थे। सन् 1967 में जब क्षेत्र के लोगों को भोटिया जनजाति घोषित किया गया तो परिस्थिति देखते हुए नौकरी के हिसाब से पढ़ने लगे। उन दिनों में तो किसी प्रकार की जानकारी भी नहीं मिल पाती थी। कोई साथी बाहर जाकर सुनता कि अमुक जगह भर्ती है या पद रिक्त है तो एक-दूसरे को बताते थे।
अल्मोड़ा से बीएससी, एम.ए.अर्थशास्त्र के अलावा बीएड करने वाले चन्दन सिंह जी ने 1975 में बैंकिंग सेवा शुरु की। स्टेट बैंक बागेश्वर में प्रथम नियुक्ति के बाद जुलाई 2012 में मैनेजर के रूप में हल्द्वानी से सेवानिवृत्त होकर अपने परिवार के साथ समय व्यतीत कर रहे हैं। श्री रावत सेवानिवृत्त होने के बाद उत्तराखण्ड ग्रामीण बैंक हल्द्वानी में 5 साल वित्तीय जागरूकता केन्द्र भी अपनी सेवाएं देते रहे। इससे सम्बन्धित जानकरी व जागरुकता के लेख पिघलता हिमालय में उनके द्वारा प्रकाशित करवाए जाते थे। समाज में चल रही उथल-पुथल को बारीकी से जानने वाले रावत जी अपने बचपन के दिनों से तुलना करते हैं- तेजम में बचपन के खेल कंचे, कबड्डी, गिल्लीडंडा था। गर्मियों में साथियों संग जाबुका नदी में जी भर तैरना फिर कुछ देर के लिये किनारे पत्थर, रेते पर बैठ कर ध्ूप का आनन्द लेने की प्रक्रिया ये आज भी हम सभी पुराने साथियों को रोमांचित कर जाता है। नदी के आासपास रहने के कारण बच्चे भी नदी में ही नहाने चले जाते और खेल करते। प्रकृति के साथ रमने वाले कई अच्छे तैराक भी बने। वह कहते हैं- जिन बातों को आज परेशानी के रूप में देखा व समझा जा रहा है वह तो आदत में सुमार था। परिस्थितियों के अनुसार बच्चे-बूढ़े अपने समय को जी रहे थे। ये हमारे समझने का फेर है। क्योंकि जिन्होंने परेशानी नहीं देखी होती है वह कठिन समय में घबरा जाते हैं। समय के साथ बदलाव होता चला जाएगा लेकिन असली धार उसी में होगी जो ईमानदार होगा। सचमुच प्रकृति के संघर्षों को उत्सव रूप में देख चुके रावत जी और इनके जैसे और भी सज्जन हैं, इनकी क्षमता और देशभक्ति की भावना का सकारात्मक प्रभाव समाज में हमेशा रहता है।

समाज के लिये निरन्तरता जरूरी है

त्रिलोक सिंह वृजवाल से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
समाज को आगे ले जाने के लिये निरन्तरता जरूरी है। नियमित ठहराव के साथ जुटने वाले विशिष्ट लोगों में से श्रीमान त्रिलोक सिंह वृजवाल का नाम उल्लेखनीय है। अपने लक्ष्य को और बढ़ा करते हुए इन्होंने जिस प्रकार की संरचना अपने समाज के लिये की उसके पीछे आर्थिक सुदृढ़ता और जरूरतमंदों को सहयोग का भाव रहा है।
पिघलता हिमालय परिवार के संरक्षक सदस्यों में शामिल श्री टी.एस.वृजवाल के दादा पान सिंह वृजवाल हुए। इनकी अगली पीढ़ी में राजेन्द्र सिंह, राम सिंह, रक्षपाल सिंह, तेज सिंह, विजय सिंह, केशर सिंह भाई हुए। भाईयों में सबसे छोटे विजय सिंह की अगली पीढ़ी के हैं- त्रिलोक सिंह। माता श्रीमती गंगोत्री देवी और पिता विजय सिंह के घर जन्म लिया- त्रिलोक सिंह और धीरेन्द्र सिंह ने। पिघलता हिमालय परिवार के संरक्षक रहे स्व.उमेद सिंह मर्तोलिया की बहन हुईं इनकी माता श्रीमती गंगोत्री देवी।
रिश्तों के इन ताने-बाने के बीच मुनस्यारी के ग्राम राछूसैन, मल्लाघोरपट्ा में 6 अपै्रल 1952 को जन्मे त्रिलोक सिंह जी की इण्टर तक की शिक्षा मुनस्यारी में ही हुई। वह बताते हैं कि गाँव का बचपन और सयानों का संरक्षण सबके लिये कारगर हुआ। इण्टर के बाद अल्मोड़ा से उच्चशिक्षा के साथ बीएड करने वाले श्री वृजवाल जी एलटी शिक्षक हो गये। नाचनी और डोर में अध्यापक के रूप में रहते हुए इनकी तैयारी जारी थी। 1978 में कपकोट में बीडीओ के रूप में तैनात हुए। समय के साथ प्रोजेक्ट डाररेक्टर के रूप में इन्हें चमोली जाना हुआ। फिर अल्मोड़ा में इसी पद पर रहे। इसके बाद डीडीओ
नैनीताल का पदभार इनके पास रहा और फिर ढाई साल तक चम्पावत में मुख्य विकास अधिकारी के रूप में रहते हुए अप्रैल 2012 में सेवानिवृत्त हुए। अपनी राजकीय सेवाओं के दौरान समाज में सजग वृजवाल जी अपने समय में बेहतरीन खिलाड़ी भी रहे हैं। बताते हैं- मुनस्यारी में खेल को उत्सव की तरह मनाने की परम्परा रही है और वह अपनी टीम के गोलकीपर बनते थे। ह्यून बर्फबारी के दिनों में भी खेल का जुनून सभी खिलाड़ियों में था। बचपन की झुंझली यादों को ताजा करते हुए बताते हैं कि व्यापार और खेतीबाड़ी ही लोगों का जरिया था। चीन के साथ 1962 के युद्ध में जब तिब्बत व्यापार टूटा तब जोहार सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। क्योंकि धारचूला के करीब नेपाल होने से और गढ़वाल में चारधम यात्रा से व्यापार की गति प्रभावित होते हुए भी रुकी नहीं जबकि जोहार एकदम अलग-थलग हो गया था। सन् 1970 से 90 तक कापफी लोग सेवाओं के लिये इधर-उधर गए। आरक्षण का यूपी में दो प्रतिशत लाभ था। पहाड़ की आर्थिक व्यवस्था तब भी मनीऑर्डर पर टिकी थी। जिन घरों में नौकरी-पेशा वाले थे, मनीऑर्डर भेजते थे।
समाज के उतार-चढ़ाव को जीने और महसूस करने वाले वृजवाल जी ने अपने साथियों के साथ ‘जोहार सहयोग निधि’ की कल्पना की और अल्मोड़ा में सौ-सौ रुपये प्रतिमाह जमा करते हुए एक निधि बनाई। 2004 में जोहार सहयोग निधि अल्मोड़ा नाम से संस्था का सहकारिता एक्ट में रजिस्ट्रेशन भी करवा लिया गया। यह संस्था आज कीर्तिमान के रूप में खड़ी है जिसमें दो करोड़ से अधिक की राशि होगी। इसके द्वारा मेधावी विद्याथर््िायों को सहयोग के अलावा जरूरतमंदों को अवसर के अनुरूप हाथ बंटाया जाता रहा है। अल्मोड़ा में संस्था का अपना भवन होना भी सुखद है। शुरुआत में जोहार सहयोग निधि कार्यालय के लिये किराए पर कमरा लिया गया था जिसका किराया भी इसके संचालक स्वयं ही अपनी-अपनी ओर से देते थे। आज इस निधि का एक बड़ा आकार होना बताता है कि कितनी दौड़भाग इसके लिये हुई थी, जो आज भी है।
श्री वृजवाल के सामाजिक कार्यों में इनके परिवार का हरदम सहयोग रहा है। इनका विवाह गीता देवी से हुआ। हिमनगरी मुन्स्यार के दुकानदार गोविन्द सिंह पांगती व श्रीमती इन्द्रा देवी घर जन्मी श्रीमती गीता 6 बहनें व 2 भाई हैं। इस परिवार के अरविन्द पांगती संयुक्त सचिव, हरीश पांगती मर्चेन्ट नेवी में हैं। त्रिलोक सिंह जी की अगली पीढ़ी को देखें तो इनकी सुपुत्री प्रीति रावत नोएडा में हैं, जमाई श्री नवीन सिंह रावत कस्टम में हैं। वृजवाल जी के सुपुत्र राजेश सिंह और मनीष सिंह वृजवाल हैं। अपने घर और समाज में सयाने की भूमिका श्री टीएस वृजवाल में हमेशा से सुमार होना बताती है कि वह कितनी कर्मठता से तत्लीन रहते हैं। उनकी यही निरन्तरता उन्हें भीड़ से अलग करती है और दूसरों को भी प्रेरणा देती है कि किसी भी स्थिति में कर्मशील रहना है।

यादों के अलावा समर्पण जरूरी है

गोविन्द सिंह जंगपांगी से बातचीज
डॉ.पंकज उप्रेती
किसी भी समाज को बनाने के लिये यादों के अलावा समर्पण जरूरी है। अपने समाज के लिये ऐसे ही समर्पित हैं श्रीमान गोविन्द सिंह जंगपांगी। वरिष्ठ नागरिक के अलावा ‘बूबू’ के रूप में प्रतिष्ठि जंगपांगी जी की बात करें तो जोहार के पदम सिंह जंगपंागी के पुत्र हुए मान सिंह जंगपांगी। पिता मानसिंह और माता श्रीमती चन्द्रा देवी के घर गोविन्द सिंह व मंगल सिंह ने जन्म लिया। 3 मार्च 1949 को बुर्फू में जन्मे गोविन्द सिंह सीमान्त के जिस दुरुह क्षेत्र से आते हैं उतनी ही गहराई उनके व्यवहार में है।
बचपन की पढ़ाई दरांती ग्राम में हुई। माइग्रेश के रूप में जब-जब परिवारों की यात्रा होती इनका परिवार भी बुर्फू से दुम्मर आता। बुपर्फू, दरांती के अलावा अपने मामकोट छिनका, गढ़वाल में शिक्षा दीक्षा के बाद अल्मोड़ा कालेज से पढ़ने वाले गोविन्द सिंह जी सन् 1071 में आर्मी में भर्ती हो गए। 6 साल तक सेना की सेवा के बाद ओरिएंटल इंश्योरेंश कम्पनी लि. में इनका प्रतिभा का लाभ मिला। मार्च 2009 में डिविजन मैनेजर के पद से सेवानिवृत्त होने वाले ‘बूबू’ जी ने समाज में अपनी सक्रियता को बरकरार रखा है।
बुर्फू से जंगपांगी परिवार मल्ला दुम्मर, भकुण्डा, इमला में रहने लगे थे। अपने बचपन की यादों में डूबते हुए गोविन्द सिंह बताते हैं- बचपन का एक खेल था केले/कदली के पेड़ की डंठ्ल में द्यार डालकर उसे जलाते हुए लालटेंन जलाते थे। परिवार ह्यून/जाड़ों में भकुण्डा आ जाता और गर्मी में बुर्फू जाता था। तिब्बत व्यापार की अवसर इन्हें नहीं मिला लेकिन वह यादें इनके साथ जुड़ी हैं जब व्यापारी तिब्बत जाते थे और वहाँ से भी आने वाले जोहार आते थे। वह बताते हैं जिस प्रकार ब्राह्मणों के जजमान
होते हैं उसी तरह तिब्बती मित्रों यहाँ के लोगों से सम्पर्क था यानी अपने-अपने घनिष्ट परिवार मित्रों के पास उनका आना-जाना था और तिब्बत लौटते समय वह उपहार स्वरूप हुनकारा तिब्बती बकरी परिवार को देकर जाते थे। हुनकारा की यादें भुलाए नहीं भूलती जब लोगों में परस्पर मेल होता था।
वास्तव में श्री जंगपांगी जी की बातों का मर्म यह बताता है कि दुर्गमता के रास्तों में राहें तब भावना हो और समाज के लिये कुछ करने की ललक। अपनी सेवाओं के दौरान समाज और मित्रों के लिये समर्पित रहे गोविन्द सिंह जी सेवानिवृत्त के बाद भी बेहद सक्रिय हैं और उनकी कोशिश हमेशा जोड़ने की रही है। मल्ला जोहार में होने वाली हरि प्रदर्शनी से लेकर अन्य तमाम आयोजनों पर ठोस कार्य के पक्षध्र श्री जंगपांगी जी पिघलता हिमालय परिवार के भी भी संरक्षक रूप में रहे हैं।
उनसे हुई भंेटवार्ता केवल समाचार विचार तक सीमित नहीं बल्कि उन पुरानी यादों को ताजा करना भी है जिससे नई पीढ़ी को उन पुराने दिनों की याद आ सके जब गर्मी-जाड़ा-बरसात में यात्राओं के बीच निकलने वालों ने अपने रास्ते हमेशा सच के साथ बनाए और बहुत ही ईमानदारी से रिश्तों को निभाया। श्री जंगपांगी प्रतिवर्ष मल्ला जोहार हरि प्रदर्शनी के लिये भी तत्परता से जुटते हैं और यत्र-तत्र निवास करने वाले प्रवासियों की टोह भी लेते हैं ताकि वह समाज के प्रति जुड़ाव बनाए रखें। इनकी सहजता-सरलता समाज के प्रति समर्पण को बताता है। वाकेई समाज में इस प्रकार के सयानों का होना सुखदाई है जो स्थितियों को सम्भालते और रास्ते दिखाने का काम करें। इनके अनुभवों का लाभ नई पीढ़ी ने लेना चाहिये।