दोनहरिया तक बीहड़ था और गौला तक की आवाज आती थी

महेश पांगती से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
हल्द्वानी महानगर के रूप में फैलता जा रहा है लेकिन इसके शुरुआती दिनों में को देखें तो पता चलता है कि किस प्रकार हल्दू के पेड़ से इसका नाम हल्द्वानी पड़ा। (हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से पुस्तक में है इतिहास) इसी हल्द्वानी के भोटिया पड़ाव क्षेत्र में शौका समुदाय का सबसे पहला परिवार डीएफओ हीरा सिंह पांगती जी का आया था। वर्तमान की चकाचौंध में हर कोई पगड़ी पहने सड़कों पर नाच रहा है लेकिन शहर, आदमी और यात्राओं की वह सच्चाई उस दौर में झांकने से पता चलती है। असल में बीहड़ जंगल से घिरा हल्द्वानी भाबर क्षेत्र चारों ओर से आने वालों का केन्द्र बना। सीमान्त क्षेत्रा के शौका समुदाय के बड़े व्यापारी महिमन सिंह पांगती ने एक बंगला बनाया था। ह्यून (जाड़ों) के दिनों में आने वाले जगह-जगह अपना ठहराव स्थल देखते थे, हल्द्वानी भी मुख्य पड़ाव बन चुका था। व्यापारी महिमन सिंह जी के सुपुत्र हुए हीरा सिंह पांगती जी। उस दौर के डीएफओ साहब का मायने ही विराट था। इनके सुपुत्रा हुए- हमेन्त सिंह, महेश सिंह, भूपेन्द्र सिंह, गगन सिंह।
आज की बातचीत श्री महेश पांगती के साथ ही है। वह बताते हैं कि दादा महिमन सिंह के समय ही हल्द्वानी मं 1938 में मकान बन चुका था। जाड़ों में रहने के लिये इस स्थान को चुना गया। बंगले के अलावा आठ बीघा जमीन इसमें थी। दादा जी का सीमान्त में व्यापार था लेकिन उन्होंने गरुड़ में अपना कारोबार शुरू कर दिया। पचास के दशक में गरुड़ क्षेत्र में भी बड़ा कारोबार था। हल्द्वानी व अन्य जगहों के लिये उनके ट्रक आते थे। 1970 में स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने गरुड़ का कारोबार समेट कर हल्द्वानी मंे रहना शुरु कर दिया।
महिमन सिंह जी के सुपुत्र हीरा सिंह जी एसडीओ नन्धौर, कोटद्वार तमाम जगह रहे। पिता के साथ जंगलों की खूब सैर महेश पांगती जी ने की है। सैलापानी, रामनगर, ढिकाला, गढ़वाल, लालढांग चारों ओर घूमने की यादों के साथ श्री महेश पांगती बताते हैं कि हल्द्वानी में हमारा बीस कमरों का बंगला था, जिसकी निचली मंजिल कमरे खाली थे और आने-जाने वालों का विश्रामस्थल भी। तब दोनहरिया तक बीहड़ था और गौला तक की आवाज आती थी। रात्रि में यह आवाज और भी भयंकर सुनाई देती थी। श्री पांगती बताते हैं की भोटिया पड़ाव में उनके परिवार के बाद धीरे-धीरे लोगों का आना शुरु हुआ। पहले शंकर मामा, मंगल मामा आए। उस दौर में किसी नेपाली कब्जेदार की बहुत चर्चा थी। बाद में उसे हटाया गया। दोनहरिया के अलावा अन्य जगहों पर पर भी जंगल होने से आबादी कम थी।
अपने बचपन के दिनों की यादों में खोते हुए श्री महेश पांगती बताते हैं पिता का ज्यादातर जंगलात सम्बन्धी दौरा होता रहता था, माता श्रीमती सरस्वती पांगती घर की व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखती थीं। एमबी कालेज घर के बगल में होने से हम भाईयों की शिक्षा यहीं से हुई। कालेज में ‘त्रिवेणी छात्रावास’ के 5 कमरे थे, जिसमें बाहर से आकर छात्र रहते थे। मैदान में फुटबाल खेलते थे और फल-फूलों के पेड़ों की हरियाली थी। एमबीपीजी कालेज से ही बीएससी करने के बाद महेश जी ने जेएनयू में प्रवेश लिया। इस बीच बैंकिग सेवा में जुड़ गये। पंजाब नेशनल बैंक में लम्बी सेवा के बाद 2017 में जनरल मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हुए। 5 साल तक महाप्रबन्धक रहे पांगती जी की सेवाएं मेरठ व दिल्ली में भी रही हैं। उत्तराखण्ड के महानगरों में गिने जा रहे हल्द्वानी की वर्तमान चकाचौंध से पहले इसकी बुनियाद को जानना हो तो पांगती जी के परिवार का चर्चा होना ही है। इनके परिवार में पत्नी श्रीमती ईला पांगती हैं। जबकि सुपुत्र मोहनीस और रजत अपने कार्यसफर में हैं।

जसमलसिंह-मंगलसिंह दरकोट में थी सबसे बड़ी फर्म

डॉ. पंकज उप्रेती
आज बाजार का स्वरूप बदल चुका है, ऑनलाइन कामकाज भी होने लगे हैं। कल्पना कीजिए उस दौर की जब आने-जाने के रास्ते बीहड़ थे और सामान ढुलान के लिये पशुओं का ही सहारा था। उन स्थितियों में दुर्गम क्षेत्र में कोई फर्म चलाना और लाखों की उधारी फंसी होने के बावजूद हंसते हुए झेलना। साथ ही प्रकृति से तालमेल बनाये रखते हुए व्यापार का तिब्बत से लेकर तराई तक सामंजस्य साधारण बात नहीं है। इस तरह के हालातों में जन्म लेने वाले डॉ. कुन्दन सिंह पांगती जी से आज की विशेष बातचीज है। डॉ. पांगती उस पीढ़ी में से हैं जिन्होंने अपनी आँखों से यह व्यापार और व्यवहार देखा है। यह प्रसंग आगे बढ़े इससे पहले पहले इनके बारे में बताते हैं- डॉ.पांगती के दादा हुए चन्द्र सिंह पांगती। चन्द्रसिंह जी रायबहादुर किशन सिंह के साथी थे। चन्द्र सिंह जी तीन भाई थे, जसमल सिंह, चन्द्र सिंह और मंगल सिंह। चन्द्रसिंह पांगती के सुपुत्र हुए बाला सिंह। पिता के निधन के बाद माता श्रीमती हेमा देवी पर बालासिंह की बड़ी जिम्मेदारी थी। उस दौर में घर के इकलौते बालक को देखते हुए जल्द ही इनका विवाह डोटिला की हरकी देवी से हुआ। ;स्व.हरकी देवी पांगती निधन 101 वर्ष की में इसी साल रविवार 26 अप्रैल 2026 को हुआ। (पिघलता हिमालय ने उनकी जीवनी पर काफी जानकारी दी है।) इनका संयुक्त परिवार मिलम दरकोट और भैंसखाल तक माइग्रेशन व्यवस्था में आवत-जावत करता रहा है। मुनस्यारी के दरकोट में जसमलसिंह-मंगल सिंह सबसे बड़ी फर्म हुआ करती थी। बालासिंह-हरकी देवी के पुत्र हुए कुन्दन सिंह, जिनका जन्म जनवरी 1947 में भैंसखाल में हुआ।

कुन्दन सिंह जी अपने बचपन के दिनों और बुजुर्गों को याद करते हुए बताते हैं- ‘भैंसखाल में जन्म के समय उन्हें मन्दिर में दिया गया और फिर उन्हें माता-पिता को सौंपा, क्योंकि इनके जन्म से पहले दो बच्चों के न बचने पर सहमे परिवार ने मन्दिर में सुपुर्द कर भगवान का आशीर्वाद चाहा। बचपन में इनका नाम गिरधर रखा गया। बाद में कुन्दन कहने लगे। इस प्रकार कोई गिरधर तो कोई कुन्दन कहता।’ इनके बाद भाई-बहनों में दमयन्ती (वृजवाल), चन्द्रा (मर्तोलिया), नवराज पांगती, कवीन्द्र पांगती हुए। इस प्रकार संयुक्त परिवार में यह सारे सदस्य भी थे।
बचपन की यादों को आगे बढ़ाते हुए डॉ. कुन्दन बताते हैं कि तिब्बत व्यापार बन्द होने से इसमें लगे लोगों की आर्थिकी खराब होने लगी थी। व्यापारियों की काफी पूंजी तिब्बत में फंसी रह गई। तब दरकोट में परिवार की फर्म ‘जसमलसिंह- मंगलसिंह’ मुख्य केन्द्र होता था। दूर-दराज से सभी लोगों को इसका आसरा था। फर्म के लिये काशीपुर से सुदामा लाल रामआश्रय, हृदयनाराण फर्म से कपड़ा आता था। इसी प्रकार हल्द्वानी की फर्म लालमणि खीमदेव से तम्बाबू सामग्री आती थी। सामान लाने के लिये पशुओं का समूह था। भेड़-बकरी भी दो प्रकार के होते हैं। 80-90 लक्खा थे और 500 से अधिक बकर। लक्खा तो सामान ढोने के लिये लगाए जाते थे और बकर अद्योली में देते थे। बकर ले जाने के लिये रिलकोटी जी, धपवाल जी और एक बसन्तकोट के थे। इसी तरह खच्चरों की देखरेख में धारचूला के श्रीराम कुटियाल और तिंकर के दिलीप सिंह भी थे। कपड़ा इत्यादि बड़ा सामान ढोने के लिये खच्चरों का उपयोग होता था। तिकसैन में पुराना ‘हयात सिंह होटल’ मशहूर हुआ करता था। डॉ.कुन्दन सिंह के पिता बाला सिंह की पधानचारी को आज भी लोग याद करते हैं। दरकोट ग्राम के लम्बे समय तक प्रधान रहे। इसके नाते भी दरकोट में दूर दराज से लोगों का जमावड़ा रहता था।
कुन्दन सिंह कक्षा 5 तक मिलम-दरकोट में पढ़ाई करने वाले बच्चों के दल में रहे हैं। तब इनके शिक्षक बासुदेव जी और बहादुर सिंह लस्पाल थे। कक्षा 5 बोर्ड परीक्षा का सेन्टर कव्वाधार में पड़ा था। मिलम जैसे सीमान्त क्षेत्र का प्राइमरी स्कूल भवन आज भी लोगों की कल्पना से परे हो सकता है। सुन्दर भवन, मुख्य द्वार, चाहरदीवारी, सुन्दर फुलवारी, फुटबाल के तीन मैदान इसमें थे। बैठने के लिये कुर्सियां। गुरुजनों के लिये बड़ी मेज। एकदम दूरस्थ में इतनी साज-सज्जा किस तरह हुई होगी। पांगती जी बताते हैं- तिकसैन का स्कूल तक नमजला में हुआ करता था। नमजला से तिकसैन बच्चों की टोली पेड़ लगाने जाती थी और घिंघारू की झाड़ से बाउण्ड्री लगाते थे। गुरुजनों की देखरेख में कालेज का सारा सामान बच्चों ने ही तिकसैन में ढोया था। छात्रावास में रहकर पढ़ाई करते थे। भोजन व्यवस्था के लिये धन सिंह कुक था। बारी-बारी से लड़के अपने घर से राशन लाते और सभी के लिये भोजन बनता था। इस प्रकार इण्टर विज्ञान का प्रथम वैच कुन्दन सिंह व साथियों का रहा। उस दौर के गुरुजनों में श्री पी.सी. पन्त एवं श्री पूरन चन्द्र पन्त जैसे विद्वान थे जिन्होंने छुट्टियों के दिनों में छात्रों को अपने घर बुलाकर तक पढ़ाया।
बचपन की इन तमाम यादों के साथ कुन्दन सिंह जी ने मेरठ मेडिकल कालेज और इलाहाबाद से पीजी किया। संयोग से टेªनिंग के लिये अल्मोड़ा आना हुआ लेकिन भाग्य में रेलवे की नौकरी थी। भारतीय रेलवे के मेडिकल में इनकी पोस्टिंग हुई। बनारस में सर्वाधिक समय 30 साल ईएनटी विशेषज्ञ के रूप में सेवा करने वाले डॉ. कुन्दन सिंह पांगती चार साल इंचार्ज रहे और अवार्ड भी मिला। दीवान सिंह टोलिया जी की सुपुत्री कुसुम जी के साथ इनका विवाह हुआ (आर.एस. टोलिया जी की बहिन हैं)। डॉ.पांगती की सफलता में श्रीमती कुसुम जी का योगदान बराबर रहा है। इनकी सुपुत्रियां रिचा, रौनी, रुचिरा भी मेडिकल क्षेत्र में योग्य हैं।
डॉ. पांगती बताते हैं- नौकरी के शुरुआती दौर में तब लखनउ से दो कोच चलती थी। टनकपुर तो रेलवे का मुख्य स्टेशन हुआ ही, चकरपुर ससुराल भी। ऐसे में बनारस से रेल का सफर पहाड़ से जोड़े रखने वाला ही था। रेलवे की ओर से मिलिट्री कैम्प का अवसर भी लगातार रहा और इन्हें मेजर पदनाम दिया गया लेकिन चिकित्सक के रूप में इन्होंने हमेशा डाक्टर पदनाम को ही सर्वोपरि रखा और सेवानिवृत्त होने के बाद भी चिकित्सा परामर्श के लिये तत्पर हैं।

जलद का शीतकालीन पड़ाव तेजम

केदार सिंह रावत से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती

जोहार के ‘खड़कू गीता’ के बारे में पिघलता हिमालय ने अपने पुराने अंक में जानकारी दी थी। इसी परिवार के श्रीमान केदार सिंह रावत एयरइण्डिया में रहते हुए दुनिया के आलौकिक नजारों को महसूस करने वालों में से हैं। एकदम सीधा सच्चा जीवन जीने में विश्वास करने वाले रावत जी से बातचीज करने से पहले इनके बारे में जानते हैं- मिलम के तिब्बत व्यापारी खड़क सिंह रावत गीता, रामायण का रुचिपूर्ण पाठ करने के अलावा वैद्यगिरी में माहिर थे, जिस कारण ‘खड़कू गीता’ या ‘गीता’ नाम से उन्हें पहचान मिल गई। आयुर्वेद के जानकार होने के कारण यह इलाज भी कर देते। व्यापारी होने के नाते दिल्ली में भी इनका सम्पर्क था, जिससे यह दवाई की खुराक मंगवा लिया करते थे। वैद्यगिरी में स्थानीय जड़ी-बूटी का प्रयोग करते। धर्मपरायण होने के कारण इन्होंने अपने पुत्रों के नाम- देवराम सिंह, हरीराम सिंह, दयाराम सिंह, श्रीराम सिंह रखा। आज भी तेजम में इनके कुनबे की पहचान ‘गीता’ या ‘खड़कू गीता’ का परिवार के रूप में है। इन चार भाईयों में श्रीराम सिंह रावत के सुपुत्र हुए- डॉ. जी.एस. रावत (देहरादून) और के.एस. रावत (हल्द्वानी)।
जोहार-मुन्स्यार के जलद में रहने वाले रावत परिवारों को शीत कालीन पड़ाव तेजम हुआ करता था, जिस कारण यह तेजम में भी बस गये। जलद में ही केदार सिंह का जन्म 1955 में हुआ। बचपन बीतने के बाद बीएससी करने के लिये यह अल्मोड़ा आ गये, इसी कक्षा का पार्ट-2 करने के लिये नैनीताल का चयन किया क्योंकि उस समय इनके भाई भीमताल में थे। इसके बाद इन्होंने आगे एमए करने की तैयारी की लेकिन इनके मामा श्री लक्ष्मण सिंह पांगती ने लखनउ से एक विज्ञापन की सूचना इन्हें भेज दी, जो एयरइण्डिया की थी। रावत जी दिल्ली चले गये और चयन, टेनिंग के बाद 1978 में एयरइण्डिया में लग गये। बात लक्ष्मण सिंह पांगती की करें तो लखनउ में रहते हुए श्री पांगती जी का दिशा-निर्देश हमेशा अपने समाज के लिये रहा है। जोहार की लोक संस्कृति और इतिहास पर लिखने वाले और समाज सुधारक बाबू राम सिंह की सुपुत्री तुलसी देवी का विवाह श्रीराम सिंह रावत से हुआ था (केदार सिंह जी माता)। इनके सुपुत्र लक्ष्मण सिंह ने भी जोहार के इतिहास और संस्कृति को सहेजने का काम किया है। साथ ही युवाओं को आगे बढ़ाने में प्रोत्साहित भी किया।
हाँ, तो बात तेजम और रावत जी की हो रही थी। एयरइण्डिया में नौकरी भले ही के.एस.रावत जी करने लगे थे लेकिन इनके मन-मस्तिष्क में अपना बचपन अपना पहाड़ कौंधता रहता। हवाई यात्राओं में दुनिया के आलौकिक नजारे बहुत देखे लेकिन अपनी जड़ों को कैसे भूल सकते थे। दिल्ली में सारी सुख-सुविधाओं के बीच भी इनका जुड़ाव अपने पहाड़ से बना रहा है। इनकी पत्नी श्रीमती कुसुमलता रावत दिल्ली में ही न्यू इण्डिया इंश्योरेंश कम्पनी में थीं। जो हल्द्वानी में इसी कम्पनी की डप्टी मैनेजर के पद से 2021 में सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। इससे पूर्व श्री रावत जी 2013 में एयरइण्डिया से मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे लेकिन एक हादसा उन्हें परेशान करने वाला रहा वह 2011में हुआ जब वह पैदल घूमने निकले थे किसी मोटरसाइकिल वाले ने टक्कर मारी जो उनके पैर को बुरी तरह घायल कर गई। ऐसे में चाह कर भी लम्बी यात्राओं से बचाव करना होता है। इनके सुपुत्र विजेन्द्र सिंह और सुपुत्री रुचि दिल्ली में ही कार्यरत हैं जबकि रावत दम्पत्ति हल्द्वानी के छड़ायल नयाबाद क्षेत्र में निवास कर रहे हैं।
श्री रावत को एयरइण्डिया में सेवा के दौरान खासे अवसर मिले जब वह देश के शीर्षतम लोगों की फ्लाइट जानी होती थी। सन् 1981 में पहली बार जब प्रधनमंत्री राजीव गांधी चायना गये, तब रावत जी को साथ जाने का मौका मिला। इसी प्रकार राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के साथ साउथ अमेरिका, ब्राजील, मैक्सिको, प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह के साथ जर्मनी दौरे किया। 2010 के कामनवेल्थ गेम्स के लिये मिली बड़ी जिम्मेदारी इन्होंने निभाई जब आस्ट्रेलिया के करीब दस छोटे-छोटे देशों के खिलाड़ियों को एकत्रित कर गेम्स के लिये दिल्ली जाया गया। इन प्रकार की जिम्मेदारियों को बेहतरीन तरीके से निभाना और अपनी जड़ों के साथ जुड़े रहने वाले रावत जी आज भी युवाओं के लिये प्रेरणा हैं कि यदि इच्छा हो तो किसी भी जगह पर आप अपनी खूबियों को दिखा सकते हो।

स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया जोहार का अनमोन नगीना

जब दुर्गा की याद में स्मृति अंक लेकर मुनस्यारी गये आनन्द

डॉ.पंकज उप्रेती
‘पिघलता हिमालय’ इस अंक के साथ ही अपनी स्थापना के 48 वर्ष पूर्ण कर चुका है। अगला अंक स्थापना के 49वें वर्ष में प्रवेश कर जाएगा। समाचार-विचार की इस लम्बी यात्रा में स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया की 86वीं जयन्ती भी है। मात्र 50साल की उम्र में वह महकता सितारा टूट गया था जिसकी यादें आज भी ‘पिघलता हिमालय’ के रूप में हैं।
समाचारों की दुनिया इस पूरी दुनिया में हिलोरे लेने लगी है और तरह-तरह के मनोरंजन के साध्नों पर लोग व्यस्त हैं परन्तु जीवन-जगत की सच्चाई तो यही है कि जब आप एकान्त या अकेले में हो तो आपकी अपनी दुनिया आपके मस्तिष्क में घूमने लगती है। अपने साथी के जाने के बाद ‘पिघलता हिमालय’ का एक विशेष अंक लेकर स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती मुनस्यारी गये थे। विश्व पर्यावरण दिवस पर जिस दिन स्व. मर्तोलिया की जन्मदिन होता है उसी दिन को याद करते हुए 1994 को दुर्गासिंह की स्मृति में यह अंक निकला था। यह केवल अंक नहीं बल्कि अपनों को जोड़ने का सीधा सा यत्न था। अंक की तैयारी के लिये नैनीताल से गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ भी हमारे घर/प्रेस ‘शक्ति प्रेस हल्द्वानी’ आए और विचार किया गया। उस दौर के संसाधनों के हिसाब से मुरादाबाद से ब्लाक बनवाना, स्क्रीन प्रिंटिग करवाना जैसे कार्य करवाए गए। इस अंक में नागार्जुन की कविता के अलावा काशीसिंह ऐरी की पहाड़ को लेकर लम्बी कविता प्रकाशित है। स्व. उमेद सिंह मर्तोलिया ने अपने भाई दुर्गा की जीवनी लिखी। सम्पादकीय मेें स्व. आनन्द बल्लभ जी ने ‘जनम अखबार का’ शीर्षक से उस सत्य को सबके सामने रख दिया जो आपाधापी में उलझे लोगों को झकझोर सकता है। कितनी पवित्रता के साथ ‘पिघलता हिमालय’ की कल्पना है इससे पता चलता है।
अंक में उम्मेद सिंह जी लेख ‘लिपू लेख पास के इस और उस पार’, श्रीराम सिंह धर्मशक्तू का लेख- ‘पिघलता हिमालय पिघलता समाज’ है। नेत्र सिंह रावत को याद करते हुए ‘पत्थर और पानी’ यात्रा संस्मरण का उल्लेख है। शेर सिंह पांगती का लेख- ‘तिब्बती शौका मित्रता’ उत्तम सिंह सयाना का जड़ीबूटियों से सम्बन्धी लेख है।
अंक की इस महक को लेकर स्व. आनन्द बल्लभ जी अपने मित्र स्व. दुर्गा सिंह की कर्मभूमि/जन्मभूमि मुनस्यारी गये। साधन/संसाध्नों की कमी अपनी जगह थी लेकिन जलाए गये दिए को बचाए रखने की जिद अपनी जगह। मुनस्यारी में उप्रेती जी के साथ पत्रकार स्व.पारसनाथ और श्री हरीश पन्त भी गये। आयोजन में ‘दुर्गा स्मृति अंक’ वितरित करने के साथ ही सभा हुई। हर कोई इस बात को कह रहा था ‘पिघलता हिमालय’ के रूप में दुर्गा सिंह की यादें जिन्दा हैं। इस सभा में गणमान्य जनों ने सीमान्त की समस्याओं के साथ ही उन क्षणों का स्मरण किया जब दुर्गा सिंह व्यवस्था के लिये शासन प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल देते थे। दुर्गा सिंह का भोलापन, फक्कड़पन, पियक्कड़ी, घुमक्कड़ी से लेकर अपने समाज को स्थापित करने के लिये जुनून का उल्लेख हुआ। इसी सभा में आनन्द बल्लभ उप्रेती ने हिमालय की गोद में बसी संस्कृति से लेकर जीवन के सच का यादगार व्याख्यान दिया था।
वर्षों की इस यात्रा में हमारे बीच पिघलता हिमालय के संस्थापक आनन्द बल्लभ उप्रेती, दुर्गासिंह मर्तोलिया और श्रीमती कमला उप्रेती नहीं हैं लेकिन उनकी व उनके साथ अनन्त यात्रा पर निकले तमाम साथियों की यादें धरोहर के रूप में है। यह केवल समाचार पत्र नहीं बल्कि इतिहास का भण्डार हो चुका है और जब-जब सीमान्त की वादियों पर शोध होंगे यह दस्तावेज बुनियाद होगा।

‘खड़कू लासा’ नाम से जाने जाते हैं ल्हासा जाने वाले खड़क सिंह

-डॉ.देवराज पांगती से बातचीज
-शौका समाज से वाई.एस.पांगती के बाद देवराज ने की थी पीएचडी
-डीडीहाट में अपनी संस्कृति बनाए रखने के लिये नन्दा और रघुनाथ मन्दिर बनाया
-डाक्टर ललित सिंह पांगती ने पिथौरागढ़ में खोला था पहला अस्पताल
डॉ.पंकज उप्रेती

आज का बाजार रसोईघर तक घुस चुका है और मिलावट का सामान चारों ओर सजा है। उन दिनों की सुनहरी यादें इतिहास बन चुकी हैं जब व्यापारी घोर यात्राओं के बाद भी रचते-बसते थे और विशुद्ध वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था। भारत-तिब्बत व्यापार में शुरुआती व्यापार में जाने वाले खड़क सिंह पांगती ‘खड़कू लासा’ परिवार के डॉ.देवराज सिंह पांगती के साथ प्रस्तुत है आज की वार्तालाप और रोचक जानकारियां। इससे पहले परिवार के बारे में बताते हैं।
खड़क सिंह पांगती जोहार घाटी के बड़े व्यापारियों में थे। 19वीं सदी के अन्त 20 वीं सदी के शुरुआत में इनकी सक्रियता थी। जोहार से तिब्बत-ल्हासा जाने वाले शुरुआती भारतीय व्यापारियों में से एक थे। मिलम-उंटाधुरा-तकलाकोट के रास्ते होने वाले व्यापार में उन, नमक, पश्मीना इत्यादि ले जाते और बदले में अनाज, गुड़, कपड़ा लाते थे। सदियों का यह व्यापार 1962 के चीन-भारत युद्ध थम गया। शुरुआती दौर में ‘ल्हासा’ जाने के कारण खड़क सिंह जी को लोक परिवेश मेें ‘खड़कू लासा’ नाम से जाना जाता था, जो वर्तमान तक भी प्रसिद्ध है। खड़क सिंह जी के तीन सुपुत्र हुए- जोत सिंह, खुशाल सिंह, ललित सिंह। जोत सिंह पांगती के परिवार में देवराज पांगती, गंगा, गीता, विमला। खुशाल सिंह के परिवार में सुशील पांगती। डॉ. ललित सिंह पांगती का असमय निधन हो गया। यह इलाहाबाद में शिक्षा ग्रहण करने के बाद पिथौरागढ़ लौटे और स्वास्थ्य व्यवस्था को देखते हुए सबसे पहला अस्पताल खोला था।
शिक्षावविद् डॉ. देवराज सिंह पांगती अपने परिवार की पृष्ठभूमि के अनुरूप गहरे व्यक्तित्व के हैं। पिथौरागढ़ मुख्यालय में निवास करने वाले पांगती जी के परिवार में श्रीमती रीता पांगती, सुपुत्र डाक्टर सौरभ पांगती हैं। जबकि विवाहित पुत्रियों में विनीता और मनीषा हैं। सन् 1955 में डीडीहाट में जन्मे पांगती जी बताते हैं कि बूबू खड़क सिंह 1947 में डीडीहाट आ गये थे। उन दिनों जबकि भारत-तिब्बत व्यापार बदस्तूर जारी था, बूबू की दूरदृष्टि थी वह डीडीहाट आएऔर दुकान खोली। इन्हंे देखा-देखी जोहार से अन्य परिवार भी डीडीहाट आए। तब इसे दिगतड़ ही कहते थे और पशुचारक अपने अनुरूप जगह चयन कर बैठते। शौका समाज ने अपनी बसासत के साथ अपनी संस्कृति को यहाँ स्थापित किया। नन्दा माई और रघुनाथ जी का मन्दिर बनाया गया। नन्दा मन्दिर स्थापना के समय तत्कालीन एसडीएम वर्मा जी का काफी योगदान रहा है।
देवराज जी की हाईस्कूल तक की शिक्षा डीडीहाट में ही हुई। 1960 में यहाँ तहसील बनी और स्कूल स्थापित होने लगे। उस समय नारायण नगर में शिक्षण की व्यवस्था थी जहाँ भागीचौरा, डीडीहाट, गर्खा तमाम जगह से विद्यार्थी आकर शिक्षा ग्रहण करते लेकिन इन्होंने सीमान्त छात्रावास में रहते हुए पिथौरागढ़ से इण्डरमीडिएट किया। इसके बाद स्नातकोत्तर भी वहीं रहते किया। डॉ. डी.सी. पाण्डे के निर्देशन में राजनीति विज्ञान विषय से पीएचडी की। तब तक जोहार घाटी से प्रोफेसर वाई.एस.पांगती पहले पीएचडी करने वाले थे जो विज्ञान वर्ग थे। इसके बाद कला वर्ग से पहले व्यक्ति प्रोफेसर देवराज सिंह पांगती हुए। इनको देखादेखी हाल के समय में कुछ युवा उच्चशिक्षा में पर्दापण कर चुके हैं।
अपनी शिक्षा के बाद 1982 में डॉ. देवराज पिथौरागढ़ कालेज में नियुक्त हुए। 1998 में नारायण नगर कालेज में प्राचार्य रहे, बलुवाकोट कालेज भी इनकी देखरेख में था। प्रमोशन होने पर 2009 में लोहाघाट गये और 2011 में पुनः पिथौरागढ़ आए और फरवरी 2020 में यहीं से सेवानिवृत्त हुए। ऐसे दौर में जब कालेजों में राजनीति हाबी हो चुकी है और निरंकुशता है, इन्होंने बहुत ही कुशलता के साथ संचालन किया। इसी अनुरूप इनका विदाई समारोह भी दिखाई दिया था।
डॉ. देवराज जी अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि डीडीहाट छोटा सा बाजार था। इसमें पुराने व्यापारियों में धनसिंह बूबू का ‘पांगती बुक भण्डार’ आज तक प्रतिष्ठित है। पूरन सिंह टोलिया बेहद सक्रिय थे और उनकी कन्ट्रोल की दुकान थी। बाद में देखादेखी कई लोग माइग्रेट होकर यहाँ बसे। रामलीला मैदान क्षेत्र मैदान था जिसमें बच्चे खेलते थे। इलाके के मुख्य व्यापारी जोहार के थे, जो अब अन्य स्थानों को जाने लगे हैं।
बातचीज के इस क्रम में श्रीमान दुष्यन्त सिंह पांगती बताते हैं कि डॉ. देवराज के पिता जोत सिंह जी रामलीला कलाकार भी थे। दशरथ, जनक की भूमिका में उन्हें आज भी याद किया जाता है। इस प्रकार बूबू खड़कू लासा की पीढ़ियां अपने कारोबार के साथ अपनी संस्कृति को बनाए हुए हैं।

तिब्बत व्यापार के वो दिन और खाजा-खजूरे

तिब्बत व्यापार के वो दिन और खाजा-खजूरे

श्रीमती पार्वती रावत-श्रीमती हेमा बृजवाल से बातचीज

डॉ. पंकज उप्रेती

भारत-चीन व्यापार की वर्तमान स्थितियां एकदम अलग हैं। इस बार लम्बे अन्तराल के बाद यह व्यापार होने वाला है, जो कोरोना कारणों से स्थगित था। इसकी तैयारी हो रही है। लेकिन हमारे सीमान्त क्षेत्र से इस व्यापार की असल परम्परा इतिहास और संस्कृति का आधार है। सीमान्त के व्यापारी अपने तिब्बत मित्रों के साथ किस प्रकार से व्यवहार रखते थे वह जानना बहुत शिक्षाप्रद है क्योंकि दुर्गम स्थानों पर प्रकृति के साथ सामंजस्य रखते हुए जो कुछ किया जाता था वह त्यौहार सा माहौल बन जाता था। ऐसी ही रोचक जानकारियों के लिये आज श्रीमती हेमा बृजवाल और श्रीमती पार्वती रावत से बातचीज प्रस्तुत है। हेमा बृजवाल और पार्वती रावत आपस में समधन हैं। इन दोनों को ही बचपन में वह अवसर देखने का सौभाग्य है जब इनके घरों से तिब्बत व्यापार के लिये जाते थे और सारे ग्रामवासी व्यापारियों को जाते समय विदाई करते और आने पर स्वागत। बताते हैं- रास्ते के लिये भरपूर खाजा-खजूरे बनाये जाते थे। बातचीज का सिललिसा चलता रहे इससे सबसे पहले हेमा बृजवाल जी के बारे में बताते हैं। दरकोट में पिता जीवन सिंह सयाना माता श्रीमती खिमुली देवी के घर इनका जन्म हुआ। तल्ला दुम्मर बृजवाल परिवार में इनका विवाह हुआ। स्व. प्रताप सिंह बृजवाल के सुपुत्र थे स्व. जसवन्त सिंह जी। हेमा देवी का विवाह जसवन्त सिंह जी के साथ हुआ। इनकी अगली पीढ़ी में स्व. केदार सिंह, मनोहर सिंह, प्रेम सिंह, वीरेन्द्र सिंह और अंजू पांगती हैं। तिब्बत व्यापारी परम्परा में प्रत्येक परिवार से कोई न कोई जाता था जब 12 साल की उम्र में जसवन्त सिंह जी भी अपने परिवार से व्यापार में गये।
हेमा देवी का बचपन दरकोट, मल्ला दुम्मर में बीता। इनके बचपन की सखियों में रुकमणि देवी, पानुली देवी, हरकी देवी रहे हैं। अपने मायके में व्यापार की जिस परम्परा को इन्होंने देखा वही सब ससुराल में भी था। विवाह के बाद एक वर्ष तक यह मल्ला दुम्मर रहीं और फिर पति संग अल्मोड़ा आ गई। 1951 में जसवन्त सिंह बृजवाल ने यहाँ कारपेट एण्ड जनरल स्टोर खोला। थोक का व्यापार बेहतर चल निकला क्योंकि बृजवाल दम्पत्ति अथाह मेहनती थे। पहले यह गंगोला मोहल्ले में रहते थे, बाद में धर की तूनी शैल गाँव में अपना मकान बना लिया। हेमा बृजवाल अपनी उनी कारोबार की परम्परा को अल्मोड़ा में भी बनाए हुए थीं और इन्होंने एक सेन्टर चलाया जिसमें दन गलीचे, पंखी, पसमीना बनाया जाता था। बकायदा बालिकाओं को इसकी ट्रेनिंग दी जाती थी। सेन्टर चलाने के लिये शुरू में लखनउफ से सरकारी इन्तजाम भी हुए जो साल तक थे, इसके बाद अपने आप से आठ वर्ष तक इस सेन्टर को इन्होंने चलाया। सेन्टर में बनने वाले विभिन्न आकार के गलीचेे व उनी सामग्री को लेने लोग इनके पास आने लगे थे। इसके अलावा उत्तरायणी मेले में बागेश्वर और व्यापारिक मेले जौलजीवी में तक यहाँ से सामान जाता था।
अब श्रीमती पार्वती रावत जी के बारे में बताते हैं। इनके बूबू प्रेम सिंह जंगपांगी और पिता मेघ सिंह जी हुए। थल, मल्ला दुम्मर और बुर्फू तक माइग्रेशन परम्परा मेें परिवार की घुमन्तु व्यवस्था थी। साथ ही तिब्बत व्यापार का कारोबार। पार्वती देवी की शिक्षा माइग्रेशन स्कूलों की उस परम्परा में हुई है। तिकसैन मुनस्यारी में रहते हुए नमजला जाकर उन्होंने पढ़ाई की। वह बताती हैं गुरुजन अपने शिष्यों के लिये बहुत मेहनत करते थे। बच्चों द्वारा भी अपने गुरुजनों के लिये बहुत आदर था और बारी-बारी से खाद्य सामग्री, आटा-गुड़-घी, चूल्हा जलाने को लकड़ी उन्हें देते थे। ऐसे में शिक्षकों को माइग्रेशन जैसी शिक्षा व्यवस्था भी नहीं अखरती और वह चित्त लगाकर मेहनत करते थे।
कुशाग्र बुदिृध की पार्वती देवी शिक्षा के बाद शिक्षा विभाग में ही नौकरी करने लगी। नौकरी में वह अल्मोड़ा से धारचूला भी गईं लेकिन विवाह के बाद नौकरी छोड़ दी और एनटीडी, अल्मोड़ा अपने ससुराल में हैं। किशन सिंह रावत परिवार से इनका सम्बन्ध है। किशन सिंह जी के सुपुत्रों में विंग कमाण्डर नौसेना ज्योति सिंह, कर्नल रणजीत सिंह, कर्नल थल सेना खुशाल सिंह, विंग कमाण्डर वायु सेना प्रतिमन सिंह हैं।
खुशाल सिंह की सुपुत्री हुईं स्व.प्रोमिला देवी इनकी अगली पीढ़ी में नेहा बृजवाल जो दिल्ली में पीएनबी में मैनेजर हैं। इस पारिवारिक ताने-बाने के बीच पार्वती रावत अपने बचपन को याद करते हुए बताती हैं- तिब्बत यात्रा पर जाने वालों के लिये खाजा-खजूरे, सत्तू तैयार कर रखते थे। एक दिन पहले आसपास सारे लोगों को बुलाकर आयोजन होता था। आलू-पूरी ज्या जैसे व्यंजनों के साथ सब बैठक करते। ढोल वादक भी बुलाए जाते थे। रात्रि के इस आयोजन के बाद अगले दिन जब तिब्बत यात्रा पर व्यापारी निकलते तो उन्हें छोड़ने के लिये दूर तक जाते। जब व्यापार करके हूणदेश से लोग वापस आते थे तो तब भी घर लीपघीस कर खूब सजाया जाता था। व्यापारियों के आने का स्वागत किया जाता था। बचपन की यादगार बातों में वह बताती हैं- बूबू और पिता जी जब तिब्बत व्यापार से लौटकर आते थे तो अपने साथ लाए सामान को देखते और सबको दिखाते। इसके अलावा एक कमरे में पैसोें का हिसाब जोड़ते, तब बच्चों को वहाँ से हटा देते लेकिन हम छोटे बच्चे दीवारों के औने-कौने से देखते क्या हो रहा है। उस कमरे में चाँदी के सिक्कों के ढेरों को अलग-अलग कर लगाते हुए गिनती होती थी। एकआना, दोआना से लेकर अलग-अलग चाँदी के सिक्कों के ढेर बच्चों के लिये कौतूहल था, जो कि व्यापारियों ने दुर्गम यात्रा करते हुए जान जोखिम में डालकर अपने व्यापार में जुटाए थे।

पर्वतीय आभूषणों का कोई सानी नहीं, आधा किलो तक की हसुली बनती थी

नवीन चन्द्र वर्मा से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
उत्तराखण्ड सरकार में वरिष्ठ नागरिक कल्याण परिषद के उपाध्यक्ष श्री नवीन वर्मा भले ही राज्यमंत्री का दर्जा रखते हैं लेकिन उनकी कार्यशैली और समाज के लिये सोच उन्हें काफी आगे पहले से बनाए हुए है। व्यापारी नेता, उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी के अलावा स्वच्छ छवि के चलते उन्हें सरकार में भी जो अवसर मिला है उनके अनुभवों का लाभ समाज को होना ही है। मूलरूप से स्वर्णाभूषण के कारोबारी परिवार से होते हुए भी नवीन वर्मा जी सोच केवल व्यापारी बनकर रहने की नहीं रही और वह सामाजिक कार्यों में हाथ बंटाते रहे हैं। उत्तराखण्ड की राजनीति और यहाँ के व्यापारी नेता के रूप में वह कितने मजबूत हैं यह जानने से पहले वर्मा परिवार के बारे में आपको बताते हैं।
यह वर्मा परिवार मूलरूप से चम्पावत के तल्लीहाट का हुआ जो रीठासाहिब (रीठा) में चला गया था। श्री नवीन वर्मा के दादा कृपालाल वर्मा के चार पुत्रा, दो पुत्रियां हुईं- हीरा लाल, मोहन लाल, विशन लाल, देवीलाल, मोहनी और जयन्ती। इसके बाद हीरा लाल जी परिवार में राजेन्द्र लाल, प्यारेलाल, सुरेश वर्मा, कलावती वर्मा। मोहन लाल जी परिवार में नवीन चन्द्र, पूरन चन्द्र, स्व. विपिन, दिनेश चन्द्र, कुसुम वर्मा। विशन लाल जी के परिवार में प्रेमा वर्मा, स्व. गिरीश, भुवन चन्द्र, विमला वर्मा, मीना वर्मा, सुध्ीर, दीपा वर्मा, ललित। देवीलाल जी के परिवार में स्व. किशन वर्मा, स्व. किशोर, दीप चन्द्र, सुनील वर्मा।
सन् 1967 तक कृपालाल जी के इस संयुक्त परिवार का एक पड़ाव हल्द्वानी का भाबर था। जाड़ों में परिवार रीठा से हल्द्वानी आ जाता था। सन् 1968 के बाद हल्द्वानी में स्थायी रूप से निवास करने लगा। हल्द्वानी के पटेल चौक में ही नवीन वर्मा का जन्म हुआ। अपने नैनीहाल पहाड़पानी में रहकर जूनियर हाईस्कूल, चम्पावत से हाईस्कूल, एमबी कालेज हल्द्वानी से इण्टर, अल्मोड़ा में बीएससी, नैनीताल में एमएससी करने वाले श्री वर्मा जी का पैतृक कार्य स्वर्णाभूषण से जुड़ा था लेकिन इनकी रुचि खेल, घुमक्कड़ी, सामाजिक कार्यों में रही है। वर्तमान में तिकोनिया के गुरुतेगबहादुर मार्ग में उनका अपना आवास है। उनके साथ सौ वर्षीय माता श्रीमती माधुरी वर्मा का आशीर्वाद है। उनकी सामाजिक अभिरुचि में साथ देने वाली पत्नी श्रीमती बीना वर्मा हैं। वर्मा जी की अगली पीढ़ी में पुत्री अमिता वर्मा, दीपक वर्मा, तनुज वर्मा हैं।
इस प्रकार भले ही तल्लीहाट फिर रीठा से वर्मा परिवार का आगमन इस भाबर में हुआ है लेकिन नवीन वर्मा तो पूरी तरह जन्म से लेकर हल्द्वानी की पहचान हैं। यही कारण है शहर में नियोजित विकास को लेकर उनकी पुरानी मुहीम रही है। कारोबार के रूप में उनका ज्वैलरी का प्रतिष्ठान है लेकिन उनकी दौड़धूप से कोई नहीं कहेगा वह व्यापारी हैं। अपने पम्परागत कार्य पर चर्चा करते हुए वर्मा जी कहते हैं- पर्वतीय आभूषणों का कोई सानी नहीं। पहाड़ों में जिस प्रकार की ज्वैलरी का चलन रहा है, हम जैसे-जैसे चीन सीमा की ओर को जाएंगे वहाँ चाँदी का ज्यादा चलन है। मैदान को आते-आते इनका प्रकार बदल जाता है और सोने के आभूषण दिखाई देते हैं। पहले 250 ग्राम तक के सूते/सुतले गले के बनते थे। हाथ के धागुले 200 ग्राम तक और हसुली लगभग आधा किलो तक की होती थी। कमरबन्ध तो 500 ग्राम से कम के बनते ही नहीं थे। पहाड़ों में सोना उतना नहीं था लेकिन चाँदी के चलन ने सारे रिवाज पूरे किये, जो आज तक भी बने हुए हैं।
अपनी पढ़ाई के साथ खेल व टेªकिंग में अभिरुचि रखने वाले वर्मा जी ने पैदल यात्रा करते हुए दो बार कैलास मानसरोवर और 5 बार आदि कैलास यात्रा की है। वह कहते हैं- यात्राओं मेें बहुत कुछ देखने और सुनने-सीखने को मिलता है। मालपा में प्रकृति के कोहराम से पहले उन्होंने कह दिया था कि मालपा से बूदी के बीच गरमपानी के कई स्रोत हैं जिससे विस्फोट हो सकता है। अपनी यात्राओं में वह केवल जाना-जाना नहीं करते बल्कि हर यात्रा के पीछे अध्ययन भी होता रहा है। हल्द्वानी के भवानीगंज स्थित डॉ. निर्मल मुनगली के वहाँ किराये पर रहते हुए 1968 में इन्होंने अपना मकान बनाया। साथ ही शहर की हर भली गतिविधियों में जुड़े रहे। 1986 में व्यापार मण्डल से जुड़ गए। नगर उपाध्यक्ष, महामंत्री, प्रदेश मंत्राी रहे। पृथक राज्य बनने के बाद 2004 में व्यापार मण्डल के संयुक्त महामंत्री, 2009 से 2018 तक महामंत्री और 2018 से प्रदेश अध्यक्ष हैं।
राज्य आन्दोलनकारी के रूप में इनकी अग्रणीय भूमिका रही है। राज्य आन्दोलनकारी छात्रा संघर्ष समिति की टीम में 5 प्रमुख लोग थे जिसमें एन.सी.तिवारी संयोजक, हेमन्त बगड्वाल, दीवान सिंह बिष्ट, हुकुम सिंह कुंवर और वर्मा जी। 1998 में जमरानी बांध निर्माण संघर्ष समिति बनी, उसमें भी ये नेतृत्व की भूमिका में थे। जमरानी बांध आन्दोलन को लेकर बंशीधर भगत शुरुआत से रहे हैं लेकिन आन्दोलन को आगे बढ़ाने में इस समिति का योगदान गिना जाता है।
खेलों में रुचि के कारण नवीन वर्मा इससे जुड़े रहे हैं। 2004 सुरेन्द्र रावत जी ने स्पोटर््स एसोसिएशन बनाई थी। 1998-99 में विविधवत रूप से हल्द्वानी महोत्सव की नींव रखी। इस प्रकार शहर व इससे बाहर भी हर प्रकार से समर्पित रहते हुए नवीन वर्मा ने जिस प्रकार का मुकाम पाया है वह हमेशा सूझबूझ मार्ग दिखाने वाला रहा है। पार्टियों के झण्डे एक तरफ, इनकी स्वयं की ईमानदारी सकारात्मक उर्जा देती है।

कज्जाकी लुटेरों का आंतक था

Hot pursuit of Kazakh Bandits by a Johari Tradar

डॉ.नारायण सिंह पांगती से बातचीज

डॉ. पंकज उप्रेती
दुनिया का कालचक्र हमेशा दुश्वारियों से घिरा रहा है। अपने वर्चस्व, अपनी भूख, अपने शौक के लिये लड़ते-भिड़ते देशों व गिरोहों की अनगिनत कथा कहानियाँ इतिहास में हैं। जहाँ शान्ति की कामना की जाती है, वहाँ भी कोई न कोई अड़चन रही है। बात करते हैं भारत- तिब्बत सम्बन्धों और इनके बीच होने वाले व्यापार की तो पता चलता है कि हमेशा से हिमालयी राज्यों व देशों का सम्बन्ध् मधुर रहा है लेकिन आक्रान्ताओं की नीयत और अत्याचार ने इन शान्त वादियों को भी नहीं छोड़ा। ऐसा ही आतंक एक बार कज्जाकी लुटेरों का था और इनका पीछा करने वालों में बहादुर शौका व्यापारी स्व.शेरसिंह पांगती का नाम है। जर्मनी के शोधार्थी एल्मार ग्रेपा ने अपने अध्ययन में भी इसकी खोज की थी, बाद में डॉ.आर.एस. टोलिया व सुरेन्द्र सिंह पांगती से प्रेरित होकर डॉ.एन.एस.पांगती-श्रीमती जया पांगती ने इस महत्वपूर्ण इतिहास को पुस्तक का रूप भी दे डाला। ‘एक जोहार व्यापारी द्वारा कज्जाकी लुटेरों का पीछा’ की चर्चा से पहले डॉ.पांगती के बारे में जान लेते हैं। एक थे- रामसिंह पंागती जी। इनके दो पुत्र हुए- शेरसिंह और लाल सिंह। शेरसिंह जी की अगली पीढ़ी में मनोहर सिंह, नारायण सिंह। डॉ. नारायण सिंह पांगती जिन उँचाईयों पर हैं, इनका बचपन उतना ही परीक्षादायी रहा है। मिलम में 1944 में जन्मे पांगती जी माइग्रेशन परम्परा के साक्षी हैं और ग्राम चिलकिया (नाचनी से पहले पुल के पास) में बचपन की पढ़ाई के बाद अपने रिश्तेदारों के पास रहकर तेजम के लोधियाबगड़, भैंसखाल, टिमटिया स्कूली शिक्षा लेने लगे। 1962 में मुनस्यारी से हाईस्कूल का प्रथम बैच ;विज्ञान वर्गद्ध के छात्र पांगती जी कक्षा 11 की परीक्षा बेरीनाग से और इण्टर अल्मोड़ा से किया। सन् 1965 में किंक जार्ज मेडिकल कालेज लखनउ से एमबीबीएस किया। सन् 1962 के बाद अपने क्षेत्रा से यह पहले युवा थे जिन्होंने एमबीबीएस किया था। इससे पहले चन्द्र सिंह रावत, जसवन्त सिंह धर्मशक्तू अपने समय के एमबीबीएस किये हुए थे। सन् 1972 में राजकीय चिकित्सा सेवा में आने के बाद 1984 में प्रमोशन पर डिप्टी सीएमओ का कार्यभार ग्रहण किया। अल्मोड़ा में सीएमएस बेस अस्पताल में रहने के बाद नैनीताल फिर 2002 में सेवानिवृत्त डाक्टर साहब ने अपनी चिकित्सा सेवा का लाभ विस्तार रूप में किया। इनके कार्यों में श्रीमती जयवन्ती (जया) पांगती जी का हरक्षण सहयोग आगे बढ़ने में फलीभूत हुआ है। सुपुत्र डॉ.मंयक, सुपुत्री श्रीमती गुन्जन, सुपुत्र- डॉ. भानू अपने कार्यक्षेत्र के अलावा सामाजिक सरोकारों से जुड़े हैं।

पांगती जी के अपने घरेलू राग से ज्यादा सामाजिक आलाप रहे हैं। तभी तो उन्होंने अपने पूज्य पिता का स्मरण करते हुए अनमोल कृति समाज को दी। डा. आर.एस.टोलिया के साथ बार-बार चर्चा करते हुए इन्होंने डॉ.शेरसिंह पांगती को उचकाया कि प्राप्त कुछ दस्तावेजों पर कार्य हो। जोहार मिलन केन्द्र के सहयोग से सन् 2009 में दुर्गा सिटी सेन्टर हल्द्वानी में उस पुस्तक का विमोचन भी हुआ। वह केवल पुस्तक नहीं बल्कि एक ऐसा दस्तावेज है जो इतिहास के रूप में उन यादों को बताता है कि किस परिस्थितियों से हम जुड़े रहे और कैसे थे हमारे बुजुर्ग। इसके अलावा भी डॉ.पांगती की लगन समाज को जोड़ने के रूप में हमेशा से है जो सकारात्मक उर्जा देती है।
डॉ.पांगती अपने बचपन को याद कर कहते हैं- पिता शेरसिंह जी और माता श्रीमती रूकमणी देवी के शैशवकाल में दिवंगत होने पर चाचा लाल सिंह जी और चाची श्रीमती उखा देवी का साया हमारे उपर था। पिता स्व.शेर सिंह पांगती के बारे में बचपन से ही खूब सुना था कि वह तिब्बत में डाकुओं का पीछा करते हुए काश्मीर गये और वहाँ से कई फोटो लाए थे। चिकित्सकीय शिक्षा पूरी कर पांगती जी राजकीय अस्पतालों में कार्यरत थे, एक बार अवकाश में अपने घर मुनस्यारी गये तो एक लिफाफा दिखा जिस पर देवनागिरी लिपि में चाचा जी का नाम-पता लिखा था। इस लिफाफे में 50 पेज का अग्रेजी में लिखा आलेख था। पूछने पर चाचा जी ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व एक जर्मनी नौजवान मुनस्यारी आया था उसने दाज्यू बडे़ भाई स्व.शेर सिंह के बारे में पूछताछ की, उसी ने भेजा है।
यहीं से डॉ. पांगती को पिता जी का वह सूत्र पता चला जो शैशवावस्था में वह पिता के जाने के बाद नहीं जान पाये थे कि उनके पिता कैसे जो थे। लिफाफे में ग्रेपा का आलेख कई बार पढ़ने के बाद पांगती जी ने तय कर लिया कि अपने बुजुर्गों की इस याद को वह संजोयेंगे और शोधर्थी ग्रेपा का धन्यवाद किया कि उसने खोज में उनके पिता के बारे में जानकारी पुष्ट की। डॉ.पांगती ने ने अपनी पत्नी जया जी के साथ निश्चय किया किया कि जर्मनी से आकर ग्रेपा ने जिस कार्य को खोजा उसे सार्वजनिक किया जाए, इसके लिये ग्रेपा और ब्रिटिश लाइब्रेरी से स्वीकृति भी ले ली। इस कार्य में डॉ.शेरसिंह पांगती का योगदान भी रहा।
भारत-तिब्बत व्यापार विषय को लेकर पिघलता हिमालय बराबर रोचक जानकारी देता रहा है। सन् 1941 में कज्जाकी लुटेरों द्वारा तिब्बत में जोहार (भारतीय व्यापारियों) का सामान लूटने तथा व्यापारी शेरसिंह पांगती द्वारा उन लुटेरों का पीछा किये जाने की घटना कम रोचक नहीं है। ग्रेपा के शोध में भी यह कहा गया कि 1980-90 के दशक तक इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी तथा कज्जाकी लुटेरों से पीड़ित व्यापारी जीवित थे। जिनकी सहायता से वह सम्पूर्ण घटनाओं से अवगत हो सका। ग्रेपा ने म्यूनिख यूनीवर्सिटी (जर्मनी) से अपना पंजीकरण करा कर दो-तीन वर्षों तक मुनस्यारी, थल और हल्द्वानी स्थित जोहार के तत्कालीन तिब्बती व्यापारियों से सम्पर्क स्थापित किया। साथ ही धरमशाला (हिमांचल प्रदेश) स्थित म्यूनिख यूनीवर्सिटी (जर्मनी) और ब्रिटेन के इण्डिया आफिस लाइब्रेरी आदि स्थानों से इन कज्जाकियों के सम्बन्ध् में महत्वपूर्ण अभिलेख उपलब्ध् करने में अथाह परिश्रम किया।
इसी शोध प्रबन्ध् का उल्लेख करते हुए हुए डॉ.पांगती बताते हैं- भारत की आजादी से पूर्व अथवा तिब्बत का चीनी प्रशासन के अधीन आने से पहले भारत और तिब्बत दो देशों के इस सीमावर्ती क्षेत्र में निवास करने वालों के बीच सदियों से जो व्यापारिक सम्बन्ध था, उन सम्बन्धें का विश्वसनीय रूप में परिपालन करते हुए ये व्यापारी अपनी बेशकीमती व्यापारिक वतस्तुएं इन तिब्बती मित्रों के पास अथवा बौद्ध मठों में छोड़ आते थे और यह सामान सुरक्षित रहता था। तिब्बती लोग अपने इन भारतीय मित्रों को धेखा देना महान पाप समझते थे परन्तु मध्य एशिया के जिस खानाबदोस समुदाय ने लूटमार करना अपना व्यवसाय बना लिया हो, उनके लिये तिब्बत जैसे असहाय और शान्तप्रिय देश में लूटमार करना कोई असम्भव कार्य नहीं था। यहीं से लूट मचना आरम्भ हुआ।

अगस्त 1941 में इन कज्जाकी लुटेरों ने तिब्बत के उत्तरी पठारी मैदान च्यांग-थांग से लूट शुरू करते हुए कैलास मानसरोवर के निकटवर्ती क्षेत्र में प्रवेश किया। इनके भय से शौका (भारतीय व्यापारियों) ने भी अपना सामान तिब्बती मित्रों के पास रखकर जान उचित समझा। लेकिन कज्जाकी जुटेरे तो सिर्पफ लूट जानते थे। इन्होंने जोहार के 43 व्यापारियों का लगभग 41 हजार रुपये का सामन लूट लिया, जिसमें राम सिंह रतन सिंह नाम के एक व्यापारिक फर्म का सबसे अधिक 13 हजार रुपये का सामान लूटा गया था। इन कज्जाकियों द्वारा लूटा गया सामान वापस प्राप्त करने के लिये इस फर्म के साहसी व्यापारी शेर सिंह पांगती ने कठिनाईयों का सामना करते हुए पीछा किया। बौद्ध धर्म के अनुयायी तिब्बती लोगों को सता रहे कज्जाकियों का आतंक जब अति हो गया था गरतोक के गरपन राज्यपाल ने इनकी रोकथाम व लूटे गये सामान को वापस प्राप्त करने की आशा से काश्मीर सरकार के अध्किारियों से निवेदन किया और स्वयं सेना के साथ पश्चिम की ओर प्रस्थान किया। साथ में जोहार के व्यापारी शेरसिंह पांगती भी थे।
कज्जाकियों ने काश्मीरी सेना की टुकड़ी पर हमला कर दिया परन्तु उन्हें पीछा हटना पड़ा। इस बीच ब्रिटिश रेजीडेन्ट से काश्मीर सरकार को पत्र प्राप्त हुआ कि भारत सरकार कज्जाकियों की गतिविधियों की पूर्ण जानकारी के बिना तिब्बत की सीमा के अन्दर अपनी सैनिक टुकड़ी भेजने की अनुमति नहीं देना चाहती है। इसके लिये शीत के दिनों में लद्दाख में वार्ता की जा सकती है। अक्टूबर में चार जोहारी व्यापारी चुसूल पहंुचं। शिविर में 40 सिपाहियों ने दमचौक के लिये प्रस्थान किया। चमचौक पहुंचकर उन्हें वहाँ की टुकड़ी को मजबूत करना था।
कज्जाकियों की ये कहानी बहुत लम्बी और रोचक है (फिर कभी)। फिलहाल पांगती जी की यादों को सलाम करते हुए बताते हैं- कज्जाकियों द्वारा लूट कर ले जाये गये सामान को प्राप्त करने के लिये शेर सिंह पांगती की भाँति गरतोक का गरपन भी तिब्बत सेना के साथ दमचौक तक गया था परन्तु कज्जाकियों के आत्मसमर्पण करने के पश्चात भी जब उन्हें कुछ भी प्राप्त न हो सकता तो मन मारकर वापस लौटते समय गरपन ने कज्जाकियों द्वारा छोड़े गये 600-700 भेड़-बकरियाँ एक आना 12 आने की दर से जोहार के व्यापारी मेघ सिंह, मानी सिंह को बेची, जो जोहार पहँुचने तक 400 ही रह गई थी। शेर सिंह पांगती ने पं.गोविन्द बल्लभ पन्त सहित तमाम बड़े नेताओं से मिलकर लूटे सामान को वापस लाने का यत्न किया लेकिन असेम्बली के 16 फरवरी 1962 की वार्ता में भाग लेते हुए गोविन्द वी देशमुख के प्रश्न के आधार पर जिन व्यक्तियों के सामान की क्षति हुई, उसके भुगतान के लिये सरकार निश्चय कर चुकी थी। परन्तु औलफ कारो ने घोषणा की कि कज्जाकियों ने जिन व्यक्तियों का सामान भारत से बाहर चुराया है, उन्हें किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति नहीं दी जा सकती है। सीध सा अर्थ था कि तिब्बत यानी देश से बाहर लूट के लिये तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार ने किसी प्रकार अपना उत्तरदायित्व नहीं समझा। सवाल आज भी बना हुआ है जिसे एक जोहारी व्यापारी ने लड़ा था।

पहाड़ की सुरसाम्राज्ञी बीना तिवारी

रतन सिंह किरमोलिया
कुमाउंनी गीत संगीत एवं गायकी की सुर साम्राज्ञी बीना तिवारी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वह कुमाउंनी और गढ़वाली गीतों की उस जमाने की गायक कलाकार रही हैं जब आकाशवाणी लखनऊ से इनकी शुरुआत हो ही रही थी। यह करीब सन् 1963 के शुरुआती दिनों की बात है। इससे पूर्व कुमाउंनी और गढ़वाली गीतों के प्रसारण की आकाशवाणी लखनऊ से कोई व्यवस्था नहीं थी। हाँ,ं स्थानीय मेलों एवं कौतिकों में लोकगीत गाए एवं बजाए जाते थे। हालांकि उस समय कुमाउंनी और गढ़वाली के कई गीतकार गीतों की रचना में लगे हुए थे। कुछ स्वयं गाते भी थे।
कुमाउंनी और गढ़वाली लोकगीतों के हिमायती कुछ प्रबुद्ध विद्वानों ने आकाशवाणी लखनऊ से ‘उत्तरायण कार्यक्रम’ नाम से इसकी शुरुआत की। इसकी जिम्मेदारी जयदेव शर्मा ‘कमल’ और जीतसिंह जड़धारी को सौपी गई। ये दोनों गढ़वाली में कार्यक्रम करते थे और कुछ कुमाउंनी के गीत बजाया करते थे। कुमाउंनी के लिए कम्पीयर के रूप में बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ को लाया गया। 7 जनवरी 1963 से वे उत्तरायण कार्यक्रम से जुड़ गए। तब कुमाउंनी गढ़वाली गीतों को गाने वाले गायक कलाकारों को खोजा जाने लगा। कुमाउंनी लोकगीत गाने के लिए बीना तिवारी का चयन किया गया। बाकायदा स्वर परीक्षा के बाद ‘बी’ हाईग्रेड कलाकार के रूप में उनका चयन किया गया। मैं समझता हूँ लोक भाषा कुमाउंनी के गीत गाने वाली तत्कालीन बी हाईग्रेड कलाकार के रूप में वह प्रथम महिला गायिका रही हैं। उन्होंने कुमाउंनी के साथ साथ गढ़वाली के भी कई लोकगीत गाए हैं। आकाशवाणी लखनऊ के उत्तरायण कार्यक्रम में उनके गाए गीतों के प्रसारण के बाद श्रोताओं से उन्हें जो प्यार और वाहवाही मिली वह काबिले तारीफ रही।
बीना तिवारी का जन्म पिता कृष्णचन्द्र और माता मोहिनी देवी के घर 14 जनवरी 1949 को लखनऊ में हुआ। उनका मूल पैतृक गाँव ज्योली अल्मोड़ा है। उनकी शिक्षा दीक्षा लखनऊ में ही हुई। उन्होंने बीए, संगीत निपुण तक की शिक्षा भातखण्डे संगीत महाविद्यालय लखनऊ से प्राप्त की। उनके संगीत एवं गायन में महारत हासिल करने में गोविन्द नारायण नातू और कृष्णराय की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में कुछ समय के लिए बेगम अख्तर और बिरजू महाराज के सानिध्य में रह कर भी उन्हें संगीत एवं गायन सीखने का अवसर मिला।
उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ से जुड़कर कुमाउंनी गढ़वाली गीतों के अलावा हिन्दी के गीत गजल एवं भजन भी गाए। आकाशवाणी लखनऊ के अलावा आकाशवाणी रामपुर, नजीबाबाद और अल्मोड़ा केन्द्रों से भी उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है।
प्रतिष्ठित गीतकारों में चारुचन्द्र पाण्डेय, शेरसिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, गोपालदत्त भट्ट, हीरासिंह राणा, बृजेन्द्र लाल साह, बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’, चन्द्रसिंह राही, केशव अनुरागी, गिरीश तिवारी ‘गिर्दा ’ आदि के गीतों का अपने सुरीले कण्ठ एवं मोहक स्वर में गाकर स्वयं भी लोकप्रियता हासिल की और गीतकारों को भी अमर कर दिया।
उस समय के इनके गाए गीत काफी चर्चित एवं लोकप्रिय रहे। उनमें जैसे- झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी, ओ परुवा बौज्यू, दे देवा बाबा जी कन्या को दान, बाट लागी बर्यात चेली, पारा भीड़ा जाणियां बटौव रे, बुरूंशी का फूलों को कुमकुम मारो, गिरधारी तेरो अति चकान, लोरी गीत और रामी बौराणी जैसे अनेकों गीतों को आपने स्वर दिया। जो आज भी सराहे जाते हैं।
आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित कई धारावाहिकों में भी आपने काम किया। बर्ष 2022 की गणतंत्र दिवस की बीटिंग रिट्रीट परेड हेतु ’‘झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी.!’ की धुन को चुना गया था। आपने 6 बर्षों तक मोतीलाल नेहरू कन्या इण्टर कालेज लखनऊ में और 19 बर्षों तक दयावती मोदी अकादमी रामपुर उ.प्र. में संगीत विषय का अध्यापन किया।
देश की नामी गिरामी कई संस्थाओं द्वारा समय-समय पर आपको करीब डेढ़ दर्जन पुरस्कारों/सम्मानों से नवाजा गया परन्तु आश्चर्य की बात है कि सरकारी स्तर पर अद्यतन आपको न संगीत नाटक अकादमी ने याद किया, न उत्तराखण्ड संस्कृति विभाग ने और न उत्तराखण्ड भाषा संस्थान ने ही आपकी कोई सुध ली। संगीत एवं गायन के क्षेत्र में इनके अमूल्य योगदान का कहीं कोई मूल्यांकन नहीं हो पाया। यहाँ तक कि वयोवृद्ध कलाकारों को मिलने वाली पेंशन से भी इन्हें महरूम रहना पड़ रहा है। उनका कहना है कि कई बार आवेदन करने के बावजूद किसी ने भी संज्ञान नहीं लिया। इस सम्बन्ध में उनका आगे कहना है कि वर्तमान में’ अपनी-अपनी और अपनों की दौड़’ में उम्र की इस दहलीज में किससे कहूं और क्या कहूं। अब तो मन खिन्न हो चुका है और अब तमन्ना भी नहीं रह गई है।
इस लेख के माध्यम से मेरा उत्तराखण्ड संस्कृति विभाग से अनुरोध है कि कम से कम उन्हें जीवन निर्वाह के लिए पेंशन तो अनुमन्य करवा देवें। उनके द्वारा लोकगीत संगीत क्षेत्रा में दिए गए करीब 50 बर्षों के अमूल्य योगदान का मूल्यांकन का उत्तराखण्ड सरकार को संज्ञान लेना चाहिए।

चायना वार के बाद तेजम प्रमुख केन्द्र था

चन्दन सिंह रावत से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
बात और चीजों को समझना भी कुशलता है। समझने का फेर तकलीफ देता है। कई बार अवरोध् दिखने वाली बातें हमारे विकास में सहायक होती हैं। विकास और विनास का यह क्रम चलता रहता है। इस प्रकार के तर्कों से जूझते हुए अपना रास्ता बनाने वाले तेजम के चन्दन सिंह रावत से आज की खास बातचीज है। जिसमें वह थल-मुनस्यारी मुख्य मार्ग पर स्थित ‘तेजम’ सहित रोचक जानकारियों से अवगत करा रहे हैं।
इससे पहले इनके बारे में जानते हैं- मिलम में एक हुए खड़क सिंह रावत। अपने जमाने के इण्डो-तिब्बत व्यापार के प्रमुख व्यक्तियों में थे। गीता, रामायण का ज्ञान और उसका वाचन करने वाले खड़क सिंह जी वैद्यगिरी भी कर लेते थे, जिस कारण ‘खड़कू गीता’ या ‘गीता’ नाम से पहचान मिल गई। आयुर्वेद के जानकार होने के कारण यह इलाज भी कर देते। व्यापार का जमाना था और बताते हैं तब दिल्ली में कहीं इनका सम्पर्क था जिससे यह दवाई की खुराक मंगवा लिया करते थे। स्थानीय स्तर पर भी जड़ी-बूटी का प्रयोग करते। र्ध्मपरायण होने के कारण इन्होंने अपने पुत्रों के नाम- देवराम सिंह, हरीराम सिंह, दयाराम सिंह, श्रीराम सिंह रखा। आज भी तेजम में इनके कुनबे की पहचान ‘गीता’ या ‘खड़कू गीता’ का परिवार के रूप में है। इन चार भाईयों में देवराम सिंह रावत के सुपुत्र हुए- प्रहलाद सिंह और चन्द्रमोहन सिंह। प्रहलाद सिंह के सुपुत्र हुए- चन्दन सिंह, डॉ. प्रद्युमन सिंह, लक्ष्मण सिंह और ईश्वर सिंह। इसी प्रकार चन्द्रमोहन रावत जी के हुए गजेन्द्र सिंह और गम्भीर सिंह रावत। श्री चन्दन सिंह रावत का जन्म 1952 में मिलम में हुआ। साकेत कालोनी हल्द्वानी में निवासरत श्री रावत और श्रीमती जमुना रावत की विवाहित सुपुत्री दीपिका और नीलिमा के अलावा सुपुत्र- नगेन्द्र रावत हैं।
मिलम में जन्मे श्री चन्दन सिंह बताते हैं सन् 1961 तक तो माइग्रेशन स्कूल व्यवस्था में पढ़ाई की व्यवस्था थी। जोहार घाटी में कक्षा 5 तक ही माइग्रेशन वाले स्कूल सीमित थे। घरों की तरह ही स्कूल भवन भी पक्के पत्थरों के बने थे, जोहार घाटी की कई विभूतियां इन्हीं स्कूलों की देन हैं। बाद में तेजम में सरकारी प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल खुले उसमें लम्बे समय तक घास के छप्पर वाली छत थी, जिसमें कक्षाओं का संचालन होता था। उन झोपड़ियों में ही कुर्सी-मेज सब होता। बकायदा टीचर्स क्वार्टर भी बने थे। समर्पित गुरुजनों की देखरेख में सबको अवसर मिले। स्कूल बहुत कम थे और प्राइमरी परीक्षा का सेन्टर भैंसकोट था जबकि कक्षा आठ बोर्ड का सेन्टर बेरीनाग में हुआ करता था। हम साथी लोग मिलकर मनकोट में कमरा लेकर रहते और अपने गांव से ही खाना बनाने वाले साथी भी साथ ही ले जाते थे। चन्दन सिंह जी के पढ़ाई का सिलसिला तेजम, मुनस्यारी और पिफर अल्मोड़ा डिग्री कालेज रहा।
इनके माइग्रेशन के गाँव का विवरण इस प्रकार है- मल्ला जोहार क्षेत्रा में मिलम, बार्डर पास, फिर मुनस्यारी क्षेत्र में जलथ, उसके बाद तल्ला जोहार की घाटियां। तेजम जहाँ 1962 के बाद स्थाई तौर पर रहना पड़ा। स्थाई तौर पर तेजम आने वाले परिवार जो प्रकृति से जुड़े थे, अतीत की कई चीजें खोई तो कई चीजें प्राप्त कीं। आज भी इनके जेहन में अपनी संस्कृति के वह दिन बसे हैं।
वह बताते हैं भारत-चीन युद्ध के बाद हालात बदलने लगे। तब तक तेजम तक ही गाड़ी आती थी। चायना वार के बाद 1964 के आसपास तेजम प्रमुख केन्द्र था। उस समय के हिसाब से इसका बाजार भी था और मुनस्यारी व दूरस्थ क्षेत्र से जिसने भी मोटरवाहन से यात्रा करनी होती वह तेजम आकर रुकता। इससे पहले गाड़ी रुकने का स्टेशन थल और शामा में रहा। चायना हमले के बाद रास्ते बनने लगे, रोड कटिंग में समय लगा। रावत जी बताते हैं- पहले जमीदारी प्रथा में हमारी काफी भूमि थी और भूमि जोतने वाले ‘अधेली’ यानी फसल का हिस्सा उनके पास पहुंचा जाते थे। बचपन में देखा है- पीठ में लादकर या घोड़े के द्वारा अनाज घर तक पहुंचता था। जमीदारी उन्मूलन में भूमि चली गई। एक ओर युद्ध में व्यापार थम गया और जमीदारी उन्मूलन में भूमि छिन गई तो स्थिति डामाडोल हो गई। तब तक पढ़ाई करने वाले भी व्यापार में ही अपना समय लगाते थे। सन् 1967 में जब क्षेत्र के लोगों को भोटिया जनजाति घोषित किया गया तो परिस्थिति देखते हुए नौकरी के हिसाब से पढ़ने लगे। उन दिनों में तो किसी प्रकार की जानकारी भी नहीं मिल पाती थी। कोई साथी बाहर जाकर सुनता कि अमुक जगह भर्ती है या पद रिक्त है तो एक-दूसरे को बताते थे।
अल्मोड़ा से बीएससी, एम.ए.अर्थशास्त्र के अलावा बीएड करने वाले चन्दन सिंह जी ने 1975 में बैंकिंग सेवा शुरु की। स्टेट बैंक बागेश्वर में प्रथम नियुक्ति के बाद जुलाई 2012 में मैनेजर के रूप में हल्द्वानी से सेवानिवृत्त होकर अपने परिवार के साथ समय व्यतीत कर रहे हैं। श्री रावत सेवानिवृत्त होने के बाद उत्तराखण्ड ग्रामीण बैंक हल्द्वानी में 5 साल वित्तीय जागरूकता केन्द्र भी अपनी सेवाएं देते रहे। इससे सम्बन्ध्ति जानकरी व जागरुकता के लेख पिघलता हिमालय में उनके द्वारा प्रकाशित करवाए जाते थे। समाज में चल रही उथल-पुथल को बारीकी से जानने वाले रावत जी अपने बचपन के दिनों से तुलना करते हैं- तेजम में बचपन के खेल कंचे, कबड्डी, गिल्लीडंडा था। गर्मियों में साथियों संग जाबुका नदी में जी भर तैरना फिर कुछ देर के लिये किनारे पत्थर, रेते पर बैठ कर ध्ूप का आनन्द लेने की प्रक्रिया ये आज भी हम सभी पुराने साथियों को रोमांचित कर जाता है। प्रकृति के साथ रमने वाले कई अच्छे तैराक भी बने। वह कहते हैं- जिन बातों को आज परेशानी के रूप में देखा व समझा जा रहा है वह तो आदत में सुमार था। परिस्थितियों के अनुसार बच्चे-बूढ़े अपने समय को जी रहे थे। ये हमारे समझने का पफेर है। क्योंकि जिन्होंने परेशानी नहीं देखी होती है वह कठिन समय में घबरा जाते हैं। समय के साथ बदलाव होता चला जाएगा लेकिन असली धर उसी में होगी जो ईमानदार होगा। सचमुच प्रकृति के संघर्षों को उत्सव रूप में देख चुके रावत जी और इनके जैसे और भी सज्जन हैं, इनकी क्षमता और देशभक्ति की भावना का सकारात्मक प्रभाव समाज में हमेशा रहता है।