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उत्तराखण्ड की ताज़ा खबरें पढ़ें • पिघलता हिमालय - साप्ताहिक पत्रिका स्थापित 1978 • हल्द्वानी से प्रकाशित • हिमालय संगीत शोध समिति के कार्यक्रम देखें • ई-पेपर डाउनलोड करें • नवीनतम अंक उपलब्ध है

👥 परिचय

पिघलता हिमालय परिवार का परिचय

पिघलता हिमालय

1978 में स्थापित पिघलता हिमालय उत्तराखण्ड का एक प्रमुख साप्ताहिक समाचार पत्र है। इसकी स्थापना स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया और स्व. आनंद बल्लभ उप्रेती ने की थी। यह पत्रिका हिमालय की संस्कृति, साहित्य और सामाजिक जागरण का माध्यम रही है।

1978
स्थापना वर्ष
48+
वर्षों की सेवा
साप्ताहिक
प्रकाशन
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🌟 संस्थापक एवं सम्पादक

स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती

स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती

संस्थापक सम्पादक, पिघलता हिमालय

21 मई 1944 को बटआमावस्या (बटसावित्री व्रत) के दिन आनन्द बल्लभ उप्रेती का जन्म माता जीवन्ती देवी व पिता राधाबल्लभ उप्रेती के घर ग्राम कूंउप्रेती (कुंजनपुर) गंगोलीहाट जिला पिथौरागढ़ में हुआ था। जब ये तीन साल के थे इनकी माता जी का निधन हो गया। पिता प्राइमरी में हैडमास्टर थे, उस दौर में यह पद बहुत ही सम्मान का था और दूर-दूर तक अध्यापक का यशगान होता था।

माता के निधन के बाद आनन्द का लालन-पालन घर के बुजुर्गों के साये में हुआ। आर्थिक संकट उनके बचपन का साथी बन चुका था लेकिन इनके संस्कार और इनकी प्रतिभा ने सम्मान दिलाती रही। उनकी प्राथमिक पढ़ाई- प्राईमरी पाठशाला गंगोलीहाट, हाईस्कूल- श्री महाकाली हाईस्कूल से हुई। पैदल रास्तों के उन दिनों में गंगोलीहाट से अल्मोड़ा रात्रि में पैदल चलकर रेमजे कालेज से इण्टर किया। हल्द्वानी व आगरा में रहकर अंग्रेजी विषय से स्नातक व स्नातकोत्तर किया।

बचपन से ही लेखन की ओर रुचि होने के कारण युवा अवस्था तक काफी लिखा। साहित्यकार डाॅ. हेमचन्द्र जोशी को गुरु रूप में मानते थे। सन् 1965 के करीब बिड़ला स्कूल नैनीताल में अध्यापन किया। 'सरिता' (1967) तथा 'सन्देश सागर' (1967) से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले उप्रेती जी ने 1978 में साप्ताहिक 'पिघलता हिमालय' की नींव रखी। अपने मित्र दुर्गा सिंह मर्तोलिया के साथ इस पत्र को स्थापित करते हुए 1980 में एक साल तक दैनिक रूप में भी निकाला।

संसाधनों की कमी व आर्थिक तंगी के कारण अखबार बन्द करना पड़ा लेकिन हिम्मत न हारने वाले उप्रेती जी ने अपने दम पर पुनः साप्ताहिक रूप में स्थापित किया। आकाशवाणी से उनकी वार्ताएं और रूपक प्रसारित होते थे। 22 फरवरी 2013 को सबसे मिलते-जुलते अचानक वह चिरनिद्रा में सो गये। डाॅ. पंकज उप्रेती, धीरज उप्रेती, मीनाक्षी जोशी उनके पुत्र-पुत्री हैं।

स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया

स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया

सह-संस्थापक, पिघलता हिमालय

5 जून 1940 को दुर्गा सिंह मर्तोलिया का जन्म माता रुकमणि देवी व पिता गोविन्द सिंह मर्तोलिया के घर ग्राम बला, मुनस्यारी में हुआ। 1957 में मुनस्यारी से हाईस्कूल, 1959 में अल्मोड़ा से इण्टर, 1961 व 63 से डीएसबी नैनीताल से बीए एमए करने वाला दुर्गा का ताल्लुक सीमान्त के व्यापारिक परिवार से था लेकिन इनकी प्रतिभा इन्हें हमेशा नया करवाती।

1962 में छात्र यूनियन के अध्यक्ष के रूप में इन्हें पहचान मिली। बीएड करने के पश्चात मसूरी के घनानन्द कालेज में अध्यापकी, 1967 में आईटीबीपी की टेहरी बटालियन में अध्यापकी के बाद यह नौकरी छोड़कर घर आ गये। हमेशा प्रयोगों में लगे रहने वाले दुर्गा ने 1971 में उत्तरकाशी के पुरोला में होटल खोल दिया, टिहरी में जड़ी-बूटी का कारोबार किया।

1976 में इनकी जीवन संगिनी का निधन होने से यह टूट गये और अपने तीन छोटे बच्चों को लेकर पुनः घर लौटे। आटा चक्की, मशरुम की खेती, अंगोरा खरगोश पालन, रिंगाल सहित तमाम तरह के कार्य करते हुए जन समस्याओं के लिये आन्दोलन में सक्रिय हो गये।

1978 में इनकी मुलाकात लेखक आनन्द बल्लभ उप्रेती से उनके छापाखाने 'शक्ति प्रेस' हल्द्वानी में हुई। संघर्षों से घिरे हुए दो पुराने साथी हमेशा के लिये एक हो गये — एक ही मिशन था अखबार निकालना। और 'पिघलता हिमालय' निकला। जीवन संघर्षों में बार-बार टूटते रहे दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने बहुत कम समय में अपने समाज को जोड़ने के लिये जितना किया वह स्मरणीय है। 15 जनवरी 1989 को वह अचानक हम सबके बीच से विदा हो गये।

स्व. दुर्गा की पुत्रियों में डाक्टर उषा जंगपांगी, श्रीमती मंजू पांगती, श्रीमती गीता जंगपांगी हैं।

स्व. श्रीमती कमला उप्रेती

स्व. श्रीमती कमला उप्रेती

सम्पादक, पिघलता हिमालय (2013–2018)

कमला देवी का जन्म 16 नवम्बर 1952 को माता इन्द्रा देवी व पिता ज्वालाप्रसाद पाण्डे के घर रानीखेत में हुआ। जालली, भटकोट के रहने वाला पाण्डे परिवार व्यवसायिक था लेकिन घर की परम्पराओं ने व्यापार के साथ संस्कार इन्हें दिये। कमला देवी ने इण्टर तक की शिक्षा रानीखेत से प्राप्त करने के पश्चात एम.बी. कालेज हल्द्वानी से हिन्दी में स्नातकोत्तर किया।

फाल्गुन 5 गते 1971 को इनका विवाह आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ हुआ। शिक्षित होने के बाद भी उस दौर में इन्होंने सरकारी नौकरी नहीं की और उप्रेती जी के साथ उनके छापाखाने 'शक्ति प्रेस' में सहयोग किया। वह दौर जब अखबार ट्रेडिल मशीन में छपा करते थे, उसकी प्रूफ रीडिंग से लेकर मशीन में कागज उठाने, अखबार मोड़ने का कार्य मिशन के रूप में किया।

जीवन को संग्राम के रूप में देखने वाली श्रीमती उप्रेती ने अस्वस्थ होने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी के रूप में वह सक्रिय रहीं हैं, जिसके लिये शासन द्वारा इन्हें राज्य आन्दोलनकारी का प्रमाण पत्र दिया गया। इनके संचालन में महिलाओं ने कई बड़े आयोजन किये।

22 फरवरी 2013 को अचानक पति आनन्द बल्लभ उप्रेती के निधन के बाद इन्होंने उनके मिशन को आगे बढ़ाने का साहस किया और पिघलता हिमालय के सम्पादक के रूप में अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता को संरक्षण दे रही थीं। 15 फरवरी 2018 की प्रातः 9 बजे 66 वर्ष की आयु में इनका अचानक निधन हो गया।

श्रीमती गीता उप्रेती

श्रीमती गीता उप्रेती

सम्पादक, पिघलता हिमालय (2018–वर्तमान)

श्रीमती गीता उप्रेती का जन्म 1 अगस्त 1986 को माता श्रीमती जानकी पन्त व पिता श्री बंशीधर पन्त के घर ग्राम सिरतोली, बेरीनाग में हुआ। अंग्रेजी भाषा से स्नातकोत्तर गीता जी का विवाह 2004 में डॉ. पंकज उप्रेती के साथ हुआ।

अपने ससुराल में ससुर-सास की सेवा के साथ इन्होंने लेखन व पत्रकारिता को सीखा। 28 जुलाई 2005 को इन्होंने पुत्र आशुतोष व 17 जून 2012 को पुत्र उत्कर्ष को जन्म दिया।

अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ ही सास श्रीमती कमला उप्रेती के निधन के बाद पिघलता हिमालय के सम्पादन का भार इनके कंधों पर आ गया। पारिवारिक पत्रकारिता की इस विरासत को वे पूर्ण निष्ठा एवं समर्पण के साथ आगे बढ़ा रही हैं।

🎵 हिमालय संगीत शोध समिति

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डा. पंकज उप्रेती

संस्थापक, हिमालय संगीत शोध समिति

1993 में हिमालय संगीत शोध समिति के संस्थापक। कुमाउनी होली और लोकसंगीत के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान। भातखण्डे संगीत विद्यापीठ से सम्बद्ध प्रशिक्षण कार्यक्रमों के निर्देशक।

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समिति के बारे में

हिमालय संगीत शोध समिति एक संस्था मात्र न होकर एक आन्दोलन है। सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में सांस्कृतिक आन्दोलन चला रही इस समिति में शिक्षक, चिकित्सक, वैज्ञानिक, कलाकार और साहित्यकार जुड़े हैं।

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'आनन्दश्री' सम्मान

पिघलता हिमालय द्वारा उत्तराखण्ड की कला, साहित्य और संस्कृति में विशेष योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को 'आनन्दश्री' सम्मान से नवाज़ा जाता है।

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