आनन्द बल्लभ उप्रेती (परिचय)

21 मई 1944 को बटआमावस्या (बटसावित्री व्रत) के दिन आनन्द बल्लभ उप्रेती का जन्म माता जीवन्ती देवी व पिता राधाबल्लभ उप्रेती के घर ग्राम कूंउप्रेती (कुंजनपुर) गंगोलीहाट जिला पिथौरागढ़ में हुआ था। जब ये तीन साल के थे इनकी माता जी का निधन हो गया। पिता प्राइमरी में हैडमास्टर थे, उस दौर में यह पद बहुत ही सम्मान का था और दूर-दूर तक अध्यापक का यशगान होता था।माता के निधन के बाद आनन्द का लालन-पालन घर के बुजुर्गों के साये में हुआ। आर्थिक संकट उनके बचपन का साथी बन चुका था लेकिन इनके संस्कार और इनकी प्रतिभा ने सम्मान दिलाती रही। उनकी प्राथमिक पढ़ाई- प्राईमरी पाठशाला गंगोलीहाट, हाईस्कूल- श्री महाकाली हाईस्कूल से हुई। पैदल रास्तों के उन दिनों में गंगोलीहाट से अल्मोड़ा रात्रि में पैदल चलकर रेमजे कालेज से इण्टर किया। हल्द्वानी व आगरा में रहकर अंग्रेजी विषय से स्नातक व स्नातकोत्तर किया।

बचपन से ही लेखन की ओर रुचि होने के कारण युवा अवस्था तक काफी लिखा। जीवन संघर्षों की गाथा को वह सहते गये और लेखक-कवि के रूप में इनकी ख्याति फैल चुकी थी। साहित्यकार डाॅ.हेमचन्द्र जोशी को गुरु रूप में मानते थे। सन् 1965 के करीब इनके सानिध्य में नैनीताल रहते हुए बिड़ला स्कूल में अध्यापन किया। शिक्षा को महादान बताते हुए इन्होंने अनगिनत लोगों को निःशुल्क शिक्षा दी। इसी समय इन्होंने ‘शक्ति प्रेस’ नाम से छापाखाना स्थापित किया। 1971 में कमला देवी और इनका विवाह हुआ। पत्रकारिता और सांस्कृतिक आन्दोलनों से घिरे उप्रेती जी के संघर्षों में श्रीमती उप्रेती ने भी बहुत श्रम किया। ‘सरिता’(1967) तथा ‘सन्देश सागर (1967) से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले उप्रेती जी ने 1978 में साप्ताहिक ‘पिघलता हिमालय’ की नींव रखी। अपने मित्र दुर्गा सिंह मर्तोलिया के साथ इस पत्र को स्थापित करते हुए 1980 में एक साल तक दैनिक रूप में भी निकाला। संसाधनों की कमी व आर्थिक तंगी के कारण अखबार बन्द करना पड़ा लेकिन हिम्मत न हारने वाले उप्रेती जी ने अपने दम पर पुनः साप्ताहिक रूप में स्थापित किया। लोकप्रिय सम्पादक के अलावा वह तमाम पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे। आकाशवाणी से उनकी वार्ताएं, रूपक प्रसारित होते थे।

हमेशा ही संघर्षों के तूफानों में घिरे रहने वाले आनन्द बल्लभ उप्रेती जी की लेखनी का कमाल उनकी पुस्तकों के रूप में देखा जा सकता है। आजीवन फक्कड़ और अपने मिशन पर कायम रहने वाले आनन्द का अपना ही आनन्द था। 22 फरवरी 2013 को सबसे मिलते-जुलते अचानक वह चिरनिद्रा में सो गये। डाॅ.पंकज उप्रेती, धीरज उप्रेती, मीनाक्षी जोशी उनके पुत्र-पुत्री हैं।

दुर्गा सिंह मर्तोलिया (परिचय)

5 जून 1940 को दुर्गा सिंह मर्तोलिया का जन्म माता रुकमणि देवी व पिता गोविन्द सिंह मर्तोलिया के घर ग्राम बला, मुनस्यारी में हुआ। 1957 में मुनस्यारी से हाईस्कूल, 1959 में अल्मोड़ा से इण्टर, 1961 व 63 से डीएसबी नैनीताल से बीए एमए करने वाला दुर्गा का ताल्लुक सीमान्त के व्यापारिक परिवार से था लेकिन इनकी प्रतिभा इन्हें हमेशा नया करवाती।

1962 में छात्र यूनियन के अध्यक्ष के रूप में इन्हें पहचान मिली। बीएड करने के पश्चात मसूरी के घनानन्द कालेज में अध्यापकी, 1967 में आईटीबीपी की टेहरी बटालियन में अध्यापकी के बाद यह नौकरी छोड़कर घर आ गये ।

हमेशा प्रयोगों में लगे रहने वाले दुर्गा ने 1971 में उत्तरकाशी के पुरोला में होटल खोल दिया, टिहरी में जड़ी-बूटी का कारोबार कियां। दुर्भाग्य ने इनका पीछा कभी नहीं छोड़ा। 1976 में इनकी जीवन संगनि का निधन होने से यह टूट गये और अपने तीन छोटे बच्चों को लेकर पुःन घर लौटे।

आटा चक्की, मशरुम की खेती, अंगोरा खरगोश पालन, रिंगाल सहित तमाम तरह के कार्य करते हुए जन समस्याओं के लिये आन्दोलन में सक्रिय हो गये। 1978 में इनकी मुलाकात लेखक आनन्द बल्लभ उप्रेती से उनके छापाखान शक्ति प्रेस, हल्द्वानी में हुई।

संघर्षों से घिरे हुए दो पुराने साथी हमेशा के लिये ऐसे एक हो गये जैसे वह कई जन्मों से जानते हों। इन मिलने में किसी प्रकार की सौदेबाजी नहीं थी। एक ही मिशन था अखबार निकालना। और ‘पिघलता हिमालय’ निकला। इन संस्थापकों की दृढ़ता से पिघलता हिमालय ने अपनी जड़े मजबूत की। सम्पादक आनन्द बल्लभ उप्रेती के रूप में दुर्गा को ऐसा मित्र मिला जिसने हमेशा उसूलों को निभाया।

जीवन संघर्षों में बार-बार टूटते रहे दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने बहुत कम समय में अपने समाज को जोड़ने के लिये जितना किया वह स्मरणीय है।

15 जनवरी 1989 वह अचानक हम सबके बीच से विदा हो गये।

स्व0 दुर्गा की पुत्रियों में डाक्टर उषा जंगपांगी, श्रीमती मंजू पांगती, श्रीमती गीता जंगपांगी हैं।

श्रीमती कमला उप्रेती (परिचय)

कमला देवी का जन्म 16 नवम्बर 1952 को माता इन्द्रा देवी व पिता ज्वालाप्रसाद पाण्डे के घर रानीखेत में हुआ। जालली, भटकोट के रहने वाला पाण्डे परिवार व्यवसायिक था लेकिन घर की परम्पराओं ने व्यापार के साथ संस्कार इन्हें दिये। कमला देवी ने इण्टर तक की षिक्षा रानीखेत से प्राप्त करने के पश्चात एम0बी0कालेज हल्द्वानी से हिन्दी में स्नातकोत्तर किया। फाल्गुन 5 गते 1971 को इनका विवाह आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ हुआ। शिक्षित होने के बाद भी उस दौर में इन्होंने सरकारी नौकरी नहीं की और उप्रेती जी के साथ उनके छापाखाने ‘शक्ति प्रेस’ में सहयोग किया। वह दौर जब अखबार ट्रेडिल मषीन में छपा करते थे, उसकी प्रूफ रीडिंग से लेकर मशीन में कागज उठाने, अखबार मोड़ने का कार्य मिशन के रूप में किया।

जीवन को संग्राम के रूप में देखने वाली श्रीमती उप्रेती ने अस्वस्थ्य होने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी और हमेषा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये। जीवन भर संघर्श में घिरे परिवार की परम्पराओं को दृढ़ता के साथ पूरा करने वाली श्रीमती उप्रेती ने 7 अक्टूबर 1971 में पुत्र पंकज को जन्म दिया। सामाजिक आन्दोलनों में भागीदारी करते हुए आनन्द बल्लभ जी के लेखन-पत्रकारिता में सहयोगी रहीं। 11 जनवरी 75 को इन्होंने दूसरे पुत्र धीरज और 1977 को पुत्री मीनाक्षी को जन्म दिया।

अपनी प्रतिबद्धा के साथ श्रीमती उप्रेती कभी भी किसी राजनैतिक पार्टी से नहीं जुड़ीं जबकि तमाम पार्टियों के षीर्श नेताओं द्वारा उन्हें सम्मानपूर्वक पार्टी में आने का अनुरोध किया जाता रहा। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी के रूप में वह सक्रिय रहीं हैं, जिसके लिये षासन द्वारा इन्हें राज्य आन्दोलनकारी का प्रमाण पत्र दिया गया। इनके संचालन में महिलाओं ने कई बड़े आयोजन किये। जनमुद्दों व तमाम महिला संगठनों के आयोजनों में इनकी भागीदारी रही है। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ पत्रकारिता के मिशन को इन्होंने बनाये रखा है। 22 फरवरी 2013 को अचानक पति आनन्द बल्लभ उप्रेती के निधन के बाद इन्होंने उनके मिशन को आगे बढ़ाने का साहस किया और पिघलता हिमालय के सम्पादक के रूप में अपनी निश्पक्ष पत्रकारिता को संरक्षण दे रही थीं। 15 फरवरी 2018 की प्रातः 9 बजे 66 वर्ष की आयु में इनका अचानक निधन हो गया।

श्रीमती गीता उप्रेती (परिचय)

श्रीमती गीता उप्रेती का जन्म 1 अगस्त 1986 को माता श्रीमती जानकी पन्त पिता श्री बंशीधर पन्त के घर ग्राम सिरतोली, बेरीनाग में हुआ। अंग्रेजी भाषा से स्नातकोत्तर गीता जी का विवाह 2004 में डॉ.पंकज उप्रेती के साथ हुआ। अपने ससुराल में ससुर-सास की सेवा के साथ इन्हेंने लेखन व पत्रकारिता को सीखा। 28 जुलाई 2005 को इन्होंने पुत्र आशुतोष व 17 जून 2012 को पुत्र उत्कर्ष को जन्म दिया। अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ ही सास श्रीमती कमला उप्रेती के निधन के बाद पिघलता हिमालय के सम्पादन का भार इनके कंधों में आ गया।

पिघलता हिमालय के संस्थापकों स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया व स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने सीमान्त को एक सूत्र में पिरोने का जो कार्य किया वह हमेशा स्मरण किया जाता रहेगा। किसी भी अखबार का कोई मिशन हुआ करता है और उसका एक पाठक वर्ग भी। जब पत्रकारिता का मिशन ईमानदार हो तो वह हमेशा निर्भीक रहती है। ऐसा ही एक निर्भीक आन्दोलन है- पिघलता हिमालय, जो मात्र समाचार पत्र न होकर आम जन की पाती है। सीमान्त की घाटियों से लेकर देश के कौने-कौने तक फैल चुके समाज की आवाज को बुलन्द करने के लिये सन् 1978 में चले अभियान ने पड़ावों के इतिहास से लेकर यत्र-तत्र बसे समूहों को सम्वाद का मंच प्रदान किया। यह पत्र किसी घेरे में नहीं बंध सकता क्योंकि हिमालय की अपनी विश्वसनीयता है। इसी प्रकार पिघलता हिमालय का आपना मिशन जो अवसरवादियों को इसमें प्रयोग की अनुमति प्रदान नहीं करेगा।

साहित्य, संस्कृति, कला, विज्ञान, इतिहास-भूगोल से लेकर राजनैतिक गतिविधियों को पि0हि0 ने हमेशा स्थान दिया है। इसके प्रकाशन द्वारा कला-संस्कृति, कहानी-कथा पर पुस्तकों को भी जन-जन तक पहँुचाया है। स्व.मर्तोलिया-स्व.उप्रेती का यह मिशन चलता रहे। इसके लिये जागरूक जनों का संरक्षण आवश्यक है।

हिमालय संगीत एवं शोध समिति

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