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📚 पुस्तक 2010

हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखें से

✍️ आनंद बल्लभ उप्रेती

🏛️ पिघलता हिमालय  |  वर्ष: 2010

पुस्तक परिचय / विवरण

स्मृतियों के झरोखे में मेरी चार पी-िसजय़यों से सहेजी गई यादों और उन यादों के साथ जुड़ा अपनापन है। बचपन में मेरे बड़बाज्यू ;दादा जीद्धसे सुनी, पिता जी द्वारा उन स्मृतियों के साथ कराया गया प्रत्यक्ष साक्षात्कार और बाद में स्वयं की अनुभूत धरोहरों के साथ पुत्रा डाॅ. पंकज उप्रेति द्वारा स्मृतियों से जुड़े स्थानों का अवलोकन और व्यक्तियों से साक्षात्कार को सहेजने का प्रयास किया गया है।
संस्मरण में वण्र्य वस्तु-व्यक्ति के अतिरिक्त लेखक स्वयं भी अंकित होता चलता है और वह तटस्थ नहीं रह पाता है। लेखक जो स्वयं देखता है, अनुभव करता है उसी का वर्णन करता है। उसमें लेखक की स्वयं की अनुभूतियां-संवेदनायें भी रहती हैं। यह जरूरी नहीं की जो मैंने मेरी नजरों से देखा, अनुभव किया वह वैसा ही हो। झरोखे से खींचा गया चित्रा यद्यपि अपने पफोकस में आये समग्र को समेट लेता है किन्तु उसमें भी कुछ अनावश्यक उभर कर सामने आ ही जाता है और कुछ महतवपूर्ण भी छिप कर रह जाता है। स्मृतियों की बारात इतनी लम्बी होती है कि उस बारात में सबको याद रख पाना भी संभव नहीं होता है और उस बारात में खो जाना भी स्वाभाविक है।
मेरे किस्सागोई के स्वभाव को नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन साह ने बार-बार हवा देकर हल्द्वानी की स्मृतियांे पर कुछ लिखने के लिए प्रेरित किया व संपादित कुछ अंशों को नैनीताल समाचार में ‘घामतपवे भाबर से साइबर युग में पफटक मारता हल्द्वानी’ शीर्षक से धारावाहिक रूप में प्रकाशित किया और पाठकों का श्रेय उसे पुस्तक का स्वरूप दे गया। <br><br>
तेज रफ्रतार से बही जा रही इस हाईटेक आॅंधी में ठहर कर सोचने का अर्थ है दबकर समाप्त हो जाना। हर युग की पुरानी पी-सजय़ी नईं पी-सजय़ी द्वारा अपनाए जा रहे किसी भी बदलाव को हजम नहीं कर पाती है। इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन आॅंधी की यह तेज रफ्रतार बहुत कुछ ऐसा मिटाती जा रही है जो हमारे अस्तित्व के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। इस लिए इस बात की जरूरत है कि इस तेज रफ्रतार आॅंधी के बीच भी ठहर कर विचार किया जाए।
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