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पुरुषोत्तम राम की कथा को नाट्य रूप में सम्पूर्ण विश्व में देखा जाता है। भारतवर्ष में ही इस कथा की मंचीय प्रस्तुति कई शैलियों में होती है। इसी की गीत नाट्य शैली उत्तराखण्ड की विशेषता है। विशेषकर कुमाउॅफ में राम की लीला का अभिनय अपनी विशिष्टता के साथ किया जाता है। इस पर्वतीय प्रदेश में जिस प्रकार यहाँ के लोक ने शास्त्राीयता के निकट जाकर रामलीला मंचन की परम्परा जारी की, वह लोक और शास्त्रा का अद्भुत संगम है।
कुमाउॅफ की रामलीला ;अध्ययन एवं स्वरांकनद्ध पुस्तक में कुमाउॅफ में रामलीला परम्परा का इतिहास, कुमाउॅफ में विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित रामलीलाओं का परिचय, अन्य राम काव्यों का प्रभाव, रामलीला गायन पद्यति, अभिनय पक्ष सहित ग्यारह दिनों तक होने वाली रामलीला मंचन के नाटक को स्वरांकन सहित दिया गया है।
लोक से उपजी और शास्त्राीयता के निकट की कुमाउॅफ की रामलीला गायन शैली सचमुच उत्कृष्ट है। इस ग्रन्थ में रामलीला का सम्पूर्ण इतिहास सहित उसकी गायन पद्यति, अभिनय पक्ष, ताल पक्ष के साथ ही ग्यारह दिनों तक गीत नाट्श शैली में होने वाली रामलीला का स्वरांकन कर इसे संरक्षित करना इन पर्वतांचल के लिये तो महत्वपूर्ण है ही, सांस्कृतिक जगत में भी एक विधा को पहचान दिलाने का शुभ प्रयास है। चूंकि डाॅ0 उप्रेती भातरखण्डे संगीत विद्यापीठ लखनउफ के ही संगीत निपुण हैं, सो इन्होंने इसमें पर्वतांचल की रामलीला का स्वरांकन उसकी परम्परा को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक रीति से किया है। शास्त्राीयता के निकट और लोक से उपजी इस परम्परा को संरक्षित करने की दिशा में किये गये प्रयासों की सराहना कहती हूं।